बुधवार, 19 अगस्त 2015

अंगुली की अंगूठी ये मेरी बन गयी कर कंगन - {कृष्ण भजन } डॉ. मुकेश पाण्डेय

मैं दीवानी श्याम पिया कि हुई हूँ ऐसी मगन
अंगुली की अंगूठी ये मेरी बन गयी कर कंगन

मैं तो नारायण की हुई दासी रे
कहे लोग मीरा है कुलनासी रे
राणा की विष मैं पिवत हांसी रे
गिरधर नागर मिले अविनाशी रे
सबमें महिमा तेरी देखी ,लागी तुझसे लगन
अंगुली की अंगूठी ये मेरी बन गयी कर कंगन


मैं तो सांवरिया के रंग राची रे
बाँधी के पग-घुंघरू मैं नाची रे
साधु की संगत भगत साँची रे
निशदिन तेरी ही मैं गुण बाँची रे
मेरे प्रभु गिरधर नागर में, ,लागे मेरा  मन
अंगुली की अंगूठी ये मेरी बन गयी कर कंगन


कोमल त्रिविध तू ही ज्वाला हरण
आगम-निगम तू ही तारण-तरण
काली नाग नाथे हे लीला करण
पाण्डेय मुकेश" पड़ा तेरी शरण
पाण्डेय मुकेश"सिर्फ तेरा ही करता रहे वंदन
अंगुली की अंगूठी ये मेरी बन गयी कर कंगन












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