शुक्रवार, 18 सितंबर 2015

ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार - डॉ मुकेश पाण्डेय

खेत खरिहान में -सगरो सीवान में फ़हरेला अंचरा तोहार 
ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार 

नदी के पार गोरी हमरो पलानी 
हवे पिरितिया के उहे निशानी 
घर बनइनि हम आन्ही से पूछ के 
बहेला हवा हमरा खिड़की से पूछ के 
चाँद के चंदनिया -शीतला के निंदिया नदिया करेले जुन्हार 
ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार 

गलिया प तोहरो सुरुज के ललाई 
हमरो पलनिया अंजोर होई जाई 
फूल के छुईह तू तितली से पूछ के 
आवे अन्हार उँहा बिजली से पूछ के 
सुखला जवरवा में हहरत आषाढ़ में बन रसबुनिया के धार 
ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार 

अंग अंग तहरो भरल सुघराई 
ऐना में तहरो ना रुपवा समाई 
उठिह भोरे अंगड़ाई से पूछ के 
देखिह शीशा परछाई से पूछ के 
अँखिया फ़रक जाई दर्पण दरक जाई 
जब होई सोरहो सिंगार 
ए गोरिया चल ना ,चल नदिया के पार 















रोंवा रोंवा डहका देहब - डॉ मुकेश पाण्डेय

हमरा के छोड़ी जदी बहरा तू जईब रोंवा रोंवा डहका  देहब 
बाटे लड़कपन करके छिनरपन आपन काम चला लेहब 

जब दिल के दिल जान लिही ,सबका के आपन मान लिही 
बुरबक लेखा ना राजा जी ,देहिया अकील से काम लिही 
इंद्रधनुषी ये तन के पहेली दोसरा से सुलझा लेहब 

पड़े ना तनिको फ़रक पिया ,तहरा उपस्थित रहला से 
जोबन में घर अब बांबे करी तहरा चहला ना चहला से 
तज के लाज लाँघ संकोच सब मर्यादा गिरा देहब 

मछरी काई साँप घोंघा उहें रही जहाँ झील बा 
सारा पड़ोस में चर्चा बाटे हमरा कहाँ पर तिल बा 
अनगिनत अनलिखल पन्ना पर दोसर ज़िल्द चढ़ा लेहब 

जाड़ा जाला ना ओढ़ला से रजाई - डॉ मुकेश पाण्डेय

आईं आईं आईं सईयां जी जल्दी से घरवा आईं 
कि जाड़ा जाला  ना ओढ़ला से रजाई 

मनवा ना लागे हमार खटिया पर 
जागल रहिले हम रतिया भर 
कवन ई दे तानी हमरा के साजा 
हो जाता सब किरकिरा ई माजा 
केकरा से दिल के कहीं हम बतिया,केकरा  से बतिआईं 
कि जाड़ा जाला  ना ओढ़ला से रजाई 

ई कवनो चाल ना हवे हो प्यार में 
आधा बीतल जाड़ बा इन्तिज़ार में 
भईल बा सब जगे ईहे रे हाला 
गेहूं के संगे संगे घुनों पिसाला 
माटी के तन पर गुमान बाटे काथी के अतने रउरा बताईं 
कि जाड़ा जाला  ना ओढ़ला से रजाई 

पहिले तू कहि देत ना अईब घरे 
हमहुँ त  रह जइतीं राजा नइहरे 
बहरी रहब जे अईब अंदर 
सब प्यार हो जाई राजा छू-मंतर 
अईब ना जदी त मिली ना नदी प्यासे मन रही जाई 
कि जाड़ा जाला  ना ओढ़ला से रजाई