यह शिक्षक दिवस नहीं राष्ट्रपति दिवस है। यह दिवस शिक्षकों के मान सम्मान का दिवस विल्कुल नहीं है। अगर कोई राष्ट्रपति राष्ट्रपति पद त्यागकर शिक्षक बनता तो अवश्य शिक्षकों की इज्जत बढ़ती पर इस देश में सब उल्टा ही होता है। राधाकृष्णन ने शिक्षण कार्य को त्याग कर राष्ट्रपति बन गए थे। इसमें कौन सा सम्मान का कार्य किया उन्होंने?
गैरीबाल्डी ने इटली को एक किया था। जीवन भर इटली के लिए कुर्बानी दिए। जब देश उन्हें राष्ट्रपति बनाने को पागल था तो वे खेती किसानी करने का फैसला लिया। कितना गर्व् किया होगा इटली का किसान?
बिहार में और खासकर पूरे मुल्क में टीचर टॉर्चर्ड हैं।किरानी भी कुर्सी नहीं छोड़ता। पहले गुरु के चरणों में पूरी सल्तनत होती थी। आज ये सल्तनत के तलवे चाट रहे हैं। स्कूलों में भोजन पका रहे हैं।
शिक्षा बाजार में है और शिक्षक इसके एजेंट हैं। गुरु द्रोण होना भी इनका सनातनी संस्कार रहा है। हर ओर से क्षरण हुआ है। शिक्षक को जान बूझकर अयोग्य बनाया जा रहा है ताकि देश की आनेवाली पीढी अराजक और अमर्यादित हो। बहुत खेल है। कोचिंग और कांट्रेक्ट एक कालिमा है। इस दिवस पर यह भी चर्चा हो।
भारत में जितने दिवस हैं सभी संकट के ही संकेत हैं। जितने संकट उतने ही दिवस?