शनिवार, 15 अगस्त 2015

कब आएगा कंत हमारा ? - डॉ. मुकेश पाण्डेय

कब आएगा कंत हमारा ?
                             मग  लिखते बिता दिन सारा
                             डूबा सूरज निकला तारा
                            मन के नभ पर व्याप्त अमावस
                            कब दिखेगा चाँद हमारा
कब आएगा कंत हमारा ?

                         फागुन आते टेसू फूले
                        'बैसाखी' पर लगे टिकोरे
                         जेठ चढ़े पर महुआ महका
                        बदल गया है मौसम सारा
कब आएगा कंत हमारा ?
                       सावन आया बदल आये
                       दामिन अभिसारण हित  लाये
                     सखियाँ झूले झूल रही हैं
                      मेरा ही मन है मुरझाया
कब आएगा कंत हमारा ?
                   बून्द झरी तो खिली केतकी
                  ताल तलइया झिल्ली बोली
                   चकवी के घर चकवा आया
                   चढ़ी अत पर चंपा बेली
                 बौरी बौरी ढूंढ़ रही मैं
                कहाँ छिपा है कंत  हमारा
कब आएगा कंत हमारा ?

{ये रचना आप आप नवभारत टाइम्स पर भी पढ़ सकते हैं लिंक है -  http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/MERI-TERI-USKI-BAAT/entry/%E0%A4%95%E0%A4%AC-%E0%A4%86%E0%A4%8F%E0%A4%97-%E0%A4%95-%E0%A4%A4-%E0%A4%B9%E0%A4%AE-%E0%A4%B01  }

अंडमान तुझपर लगा कला पानी का दाग -- डॉ. मुकेश पाण्डेय

अंडमान  तुझपर लगा कला पानी का दाग
दाग़  से निकले प्रेम फव्वारा न कि  निकले आग
तेरा मन सागर सा गहरा प्यार नदी की धार
तुझसे मिल खो जाएँ तुझी में इतना करता प्यार
पढ़ सुन तेरी करुणा गाथा बातें ना हो पूरी
जितनी तेरी बातें समझूँ उतनी लगे अधूरी
प्रेम तेरा देखा है इतना साहिल नहीं मिला है
ज़ख्म बहुत देखे हैं जिनको मरहम  नहीं मिला है
मुकेश " तेरा भाग्य सितारा ,कहीं नहीं कुछ दोष
क्या और कहाँ किसको कहूँ नहीं कुछ होश 

फूल सहरा में खिला दे कोई - डॉ. मुकेश पाण्डेय

फूल सहरा में खिला दे कोई
मैं  अकेला हूँ सदा दे कोई

कोई सन्नाटा -सा उठा दे कोई
काश !तूफ़ान उठा दे कोई

जिसने चाहा था मुझे पहले पहल
उस सितमगर का पता दे कोई

जिससे टूटे मेरा पिन्दार-ए-वफ़ा
मुझको ऐसी भी सजा दे कोई

रात सोती है तो मैं  जागता  हूँ
उसको जाकर ये बता दे कोई

जो मेरे पास भी है दूर भी है
किस तरह उसको भूला दे कोई

इश्क के रंग लिए फिरता हूँ
उसकी तस्वीर बना दे कोई

दिल के ख़िरमन में निहाँ हैं शोले
अपने दामन की हवा दे कोई

फूल फिर ज़ख्म बने हैं मुकेश"
फिर ख़िज़ाओं को दुआ दे कोई  

दगा किसी का सगा नही दगा न करियो भाई - डॉ. मुकेश पाण्डेय

दगा किसी का सगा  नही दगा न करियो भाई 
मरवाना चाहे था ब्राह्मण को ,मर गया ख़ुद  नाई 

बुरा कहो मत बुरा सुनो मत ,बुरा किसी का न कर बन्दे 
हर देगा हरि कष्ट तेरे तू बिलकुल नहीं डरे बन्दे।। टेक।।

नौ महीने तक नर्क कुण्ड में रही भटकती खोड़  तेरी 
हाड़ मांस के बंद लगाकर दी कंचन काया जोड़ तेरी।। टेक।।


ये देश के जवानो चलना संभल संभल के - डॉ. मुकेश पाण्डेय

ये देश के जवानो चलना संभल संभल के 
दुश्मन जो आगे आवे बढ़ना मसल मसल के 

अभिमान देश का तू तू शान देश का है 
तेरे दिल की हर धड़कन अरमान देश का है 
बढ़ते सदा ही रहना झपकें न तेरी पलकें 
ये देश के जवानो चलना संभल संभल के 

तूफान की लहर हो चाहे शूल की डगर हो 
दुश्मन की टोलियों का तुझे हर घडी खबर हो 
निकले तेरी जनाज़ा लाशों पे चाहे चलके 
ये देश के जवानो चलना संभल संभल के 

सर बांध ले कफ़न को ललकार दे दुश्मन को 
अपने लहू से सींचो इस देश के चमन को 
मुकेश "आगे बढ़ना कन्धा बदल बदल के 

गणेश विनय - डॉ. मुकेश पाण्डेय

प्रथम मैं  सुमिरन करूँ गौरी पुत्र गणेश 
तीन देव रक्षा करें ब्रह्मा विष्णु महेश 

विघ्न हरण मंगल करण ,होत  बुद्धि प्रकाश 
नाम लेत  श्री गणेश का विघ्न होत सब नाश 

नहीं विद्या नहीं ज्ञान कछु नहीं बुद्धि अपार 
मोदक प्रिय सन्तन सुखद तुम्ही एक अधार 

भोजपुरी भाषा रचित करो लाज मम आन 
पाण्डेय मुकेश की लालसा ,पुराबहुं श्री भगवान 


समर्पित परिवेश को - डॉ. मुकेश पाण्डेय

अपने जीवन की कटुता 
लो आज तुम्हे लौटा दूँ 

मेरी मन की सुख क्रीड़ा 
साधना अनंत वर्षों की 
मेरे मन का अन्तर्दुख 
छाया जग अभिशापों की 
अमरत्व पिया है जिनका 
मैंने प्यासे अधरों से 
वह सत्य तुम्हे लौटा दूँ 


क्षीर नीर भेदक सदा ही जहाँ वाहन है- डॉ. मुकेश पाण्डेय

क्षीर नीर भेदक सदा ही जहाँ वाहन  है
ज्ञान की प्रवाहित अखंड जहाँ धारा  है  

ग्रंथो से ही ज्ञान-ग्रंथियों को जहाँ दूर कर 
विश्व में प्रकाश ही प्रकाश को प्रसारा  है 

वीणा के स्वरों में सब ताप  दाप धूल जाते 
श्वास श्वास में ही तव स्वर को उचारा है 

मातु शारदा से हुआ वेदों का विकास 
जिसे विधि ने पढ़ा तो चतुरानन पुकारा है 

मातम है या शादी है - डॉ. मुकेश पाण्डेय

मातम है या शादी है 
मय्यत पूंजीवादी है 

बातें सब बारीक़ महीन 
तन पर मोटी खादी है 

जनता चुप है संसद मौन 
आखिर कौन फसादी है

पंच  बना जो दुनिया का 
जंग उसी ने लादी है 

आती जाती सांसों को 
हर पल एक मुनादी है 

जीवन है हदबंदी में 
मरने की आजादी है 

ऐसा है जनतंत्र यहाँ 
जनता ही फ़रियादी है 

ग़ज़लें गीत कहानी छोड़ 
वक़्त की ये बर्बादी है 

उसको इज़्ज़त देगा कौन 
जिल्ल्त का जो आदि है 

शेर सुनाता रहता है 
मुकेश" भी बकवादी है 

हम जिस घडी इस मुर्शद ए कामिल से आ मिले - डॉ. मुकेश पाण्डेय

हम जिस घडी इस मुर्शद ए कामिल से आ मिले 
कश्ती में इसकी बैठ के साहिल से आ मिले 

गुमराह मुसाफिर थे ठिकाना न था कोई 
रहबर के कदम थाम  के मंज़िल से आ मिले 

मुर्शद की बात मान  के गैरों को जिस घड़ी 
अपना बना लिया तो दिल दिल से आ मिले 

जिसने सुकून ओ चैन मुकेश " तुझको दे दिया 
जग छोड़ के इस साहिबे हासिल से आ मिले  

छलक रही है नशीली शराब आँखों से - डॉ. मुकेश पाण्डेय

छलक रही है नशीली शराब आँखों से 
टपक रहा है किसी का शबाब आँखों से 

हमारे दिल में वो मेहमान बन के बैठे हैं 
पढ़ाई है हमें दिल की किताब आँखों से 

बस इक झलक में ही दीवाने दिल लूटा बैठे 
उठाई यार ने जिस दम नक़ाब आँखों से 

ग़रज़ नहीं है हमें मैक़दे से ऐ वाईज़ 
हमें पिलाई गयी है शराब आँखों से 

इशारा आँखों से जिस को किया था महफ़िल में 
दिया है उसने भी हमको जवाब आँखों से 

वो आँखें नीची किया चुप खड़े हैं क्या कीजे 
न जाने जायेगा कब तक हिज़ाब आँखों से 

छिटक रही है चारों तरफ़ ख़ुदा की क़सम 
छिटक रहा है किरन आफ़ताब आँखों से 

बाजार से निकले हैं लोग बेंच के घर को - डॉ. मुकेश पाण्डेय

बाजार से निकले हैं लोग बेंच के घर को 
क्या हो गया है जाने आज मेरे शहर को 

कितने हैं मेहरबान यहाँ के बहेलिये 
कहते हैं परिंदो से 'उड़ो 'काट के पर को 

गिला है कहीं सुबह की खुशियों का क़हक़हा 
चुप-चुप कोई  रोया  हैं रात पिछले पहर को 

चूल्हों में है बुझी हुई जलती है जिगर में 
कैसी अजीब आग मिली ज़िंदगी भर को 

ठहरी हुई है भीड़ एक ऊबती हुई 
लगता है कोई रहनुमा निकला है सफर को 

चेहरों में कई चेहरे दिखाई मुझे देते 
यह कौन सी नज़र लगी है मेरी नज़र को 

कहते हैं वे की रुकिए नहीं ,चलते जाइए 
चलते तो हम हैं चल के मगर जाएँ किधर को 

खेले वो दिल के साथ कि खेले जिगर के साथ - डॉ. मुकेश पाण्डेय

खेले वो दिल के साथ कि खेले जिगर के साथ
अबरू  की भी कमान है ,तीरे -नज़र के साथ

मत पूछिये ज़बां से मेरी तुम शबे -फ़िराक़
क्या-क्या हुवे मज़ाक मेरी चश्मे -तर के साथ

दिल की लगी से जो हुवे मज़बूर हर तरह
रोये लिपट लिपट के वो दीवारो-दर के साथ

हर राहरौ को इसकी ख़बर तक न हो सकी
कुछ राहज़न भी चलते रहे , राहबर के साथ

मुझसा भी ज़िंदगी में न मज़बूर  हो कोई
मह्शर में ले गए हैं मुझे क़त्ल गर के साथ

जब तक हमारे दिल में है मंज़िल की आरज़ू
उलझेंगे गाम-गाम पे ख़ौफ़ो -ख़तर  के साथ

मुकेश"जहाँ में क्या करे रुस्वा कोई उन्हें
जो लोग ऐब करते हैं लेकिन हुनर के साथ

उनके बख्शे हुवे दर्द में लज़्ज़त न रही -डॉ. मुकेश पाण्डेय

उनके बख्शे हुवे दर्द में लज़्ज़त न रही 
चैन से जीने की फिर कोई भी सूरत न रही 

ख़ून-ए -दिल  दिल पी  के गुज़र करनी पड़ी फिर हमको 
हमसे जब साक़िए -महफ़िल को मुरव्वत न रही 

तेरे जलवों की तजल्ली का तो क्या कहना मगर 
अपने दिल में ही वो जज़्बात ,वो  हिम्मत न रही 

कैसे दुनिया में मज़े लुटे कोई ज़न्नत के 
जबकि तक़दीर में वो ऐश ,वो इशरत न रही 

इक नज़र देख उन्हें भी तू ,ज़रा ऐ साक़ी 
जाम के रहते जिन्हे पीने  की हसरत न रही 

क्या सुने किससे  सुने किसकी कहानी आख़िर 
शैखो -ब्रह्मन की भी जब दहर में इज़्ज़त न रही 

जुल्फ की ख़ुश्बू उड़ा दी है हवा में ,क्या तूने 
किसलिए फूल में वो रंग ,वो नकहत  न रही 

पीरे मयख़ाना पिलाता रहा इस पहलु से 
तौबा करने की किसी रिन्द  को फुर्सत न रही 

ख़ून करना पड़ा अरमानों का हमको मुकेश" 
जब भरी बज़्म में,साक़ी की इनायत न रही 













रहम हरगिज़ न कीजिये साहब - डॉ. मुकेश पाण्डेय

रहम हरगिज़ न कीजिये साहब
शौक से जान लीजिये साहब

बज़्मे-दुश्मन और आपके जलवे
ज़ख्म ऐसे न दीजिये साहब

साँस उखड़ी है और खुली आँखें
हो सके तो पसीजिए  साहब

मस्तिए-इश्क़ चाहते हो अगर
उनकी आँखों से पीजिये साहब

कोई  दिल को अगर  मांगे मुकेश "
मैं  भी कह दूंगा लीजिये साहब  

यार अगर इक बार मिलेगा - डॉ. मुकेश पाण्डेय

यार अगर इक बार मिलेगा
दिल को चैन क़रार मिलेगा

खोज में तेरी घर से चला हूँ
तेरा कहीं तो द्वार मिलेगा

देख लो दिल को चीर  के सीना
इसमें तुम्हारा प्यार मिलेगा

सबसे दिल की बात कहूँगा
कोई तो सच्चा यार मिलेगा

रहबर के बदले रहज़न ही
राह में बारम्बार मिलेगा

मुकेश" क्यों दुनिया छाने है
दिल में तेरा दिलदार मिलेगा 

कईलू तू जग के रखवाली ,जय हो दुर्गे काली - डॉ. मुकेश पाण्डेय

अनगिनत रूप में अइलू -संकट में प्रगट तू भइलू 
कईलू तू जग के रखवाली ,जय हो दुर्गे काली 

पटन देवी पटना में तू ही -डुमरेजनी डुमराव में 
आरा में आयरन  माई-महथिन बिहिया गाँव में 
मुजियर में मंगला रानी नटवार में भलुनी भवानी 
थावे में थावे वाली ,जय हो ………।  

मुण्डेश्वरी तू ही कैमूर में कामाख्या गहमर में तू 
बरमाईन बलिया बसंतपुर या देवी मईहर में तू 
शंकरपुर में तू भगवती ,सइया दियर  में सती 
पावागढ़ तू मुण्डमाली , जय हो…………………… 


विंध्यवासिनी विंध्याचल वैष्णो देवी कश्मीर में 
क्षीणमस्तिका रजरप्पा देवी माई सिरियापुर में 
जग तहरे पग अवशेष ,विशेष हो या मुकेश "
कलिका तू कलकत्ता वाली ,जय हो। ................... 

हे थावे वाली अब रउरे कुछु करी- डॉ. मुकेश पाण्डेय

ओझा जी कहेले की धईले बिया मढ़ी 
हे थावे वाली अब रउरे कुछु करी 

सईयां ला हम त  भाड़ा भखले बानी 
कलशा दशहरा में हम रखले बानी 
कहीं रउरा पूजा में का आख़िर चढ़ी ?
हे थावे वाली अब रउरे कुछु करी 

जिनगी के शान हमार हउवें सजनवा 
पूजत रहेब माई राउर चरनवा 
क़िस्मत में हमरा रउरे रंग भरीं 
हे थावे वाली अब रउरे कुछु करी 


पाण्डेय मुकेश" हमसे बोलत नाहीं 
बाड़े  भकुआइल आँख खोलस नाही 
हमरा त लागल बाटे थरथरी 
हे थावे वाली अब रउरे कुछु करी 

दुर्गा माई के होता जयकार - डॉ. मुकेश पाण्डेय

चम चम चमके मुकुट माई माथे 
हाथन में बाटे हथियार 
दुर्गा माई के होता जयकार 


हे बाघवाळी खप्पर वाली काली 
ऊँचे ऊँचे पर्वत विंध्याचल वाली 
हे अम्बे-जगदम्बे काली भवानी 
तू ही हऊ करूणा के सार 
दुर्गा माई के होता जयकार 

सृष्टि कर्ता धर्ता संहर्ता के दात्री 
अपना भगतवन के भाग्य विधात्री 
दर्शन से करतल हो जाता मनवा 
फलवा  हो जाता रसदार 
दुर्गा माई के होता जयकार 

कामरूप कामख्या विंध्याचल मईहर में 
पाण्डेय मुकेश " भेष देखस राउर घर में 
ममतामयी माई राउर ममता के 
अदभुत परेला फ़ुहार 
दुर्गा माई के होता जयकार 

जाहु हम जनिती शीतली अइहें अंगना -डॉ. मुकेश पाण्डेय

जाहु हम जनिती शीतली अइहें अंगना 
त रुनु झुनू ना ,बजवइतीं बारहो बजना 

अंगना में निमिया के गछिया लगइतीं 
ताहि पर मईया के झुलुआ झूलइति 
देवल गमकइती छिटवइति छाक चानना
त रुनु झुनू ना ,बजवइतीं बारहो बजना 

कोरे कलशवा में गंगा जल भरिति 
पुड़िया पकाई माई खाती हम धरिति 
चुनरी चढईती लाल- लाले चूड़ी कँगना 
त रुनु झुनू ना ,बजवइतीं बारहो बजना 

खोजी कवनो गायक से पचरा गवइति 
पाण्डेय मुकेश " से रहिया धोवइति 
पाँव पर पटकी माथ करत रहिति वंदना 
त रुनु झुनू ना ,बजवइतीं बारहो बजना 

हे सेवका के श्रद्धा पुराव -डॉ. मुकेश पाण्डेय

माई  आव आव आव आव 
हे सेवका के श्रद्धा  पुराव 

दिलवा के दियरी में नेहिया के बाती 
श्रद्धा के तेलवा जराईं  दिन राती 
बानी शरण में आके उठाव

डॉ. मुकेश पाण्डेय




कईले जोगाड़ बानी फूल   पान पात
एतना से बेसी हमार नईखे अवक़ात 
कवने  विधि करीं पूजन बताव 

हमरा त अन्न धन चाहीं ना ज़ियादा 
मुकेश"के मांगे के बा एकहि इरादा 
अपना भक्तन में भक्ति जगाव 



हो गयी शाम जाम दे साक़ी-डॉ. मुकेश पाण्डेय

हो गयी शाम जाम दे साक़ी 
अपनी चाहत के नाम दे साकी 

 आज एक ऐसा दौर चल जाए 
मैं पियूं और नशा तुझे आए
दोस्ती का वो जाम दे साक़ी
डॉ मुकेश पाण्डेय 
 

 रंग है रूप है जवानी है 
आज भी शाम क्या सुहानी है 
अब तो लहरा के जाम दे साक़ी 

प्यार की वो शराब हो ऐसी 
मयकशी लाज़वाब हो ऐसी 
ज़िन्दगी भर जो काम दे साक़ी 

कर कर दो करम माँ - डॉ. मुकेश पाण्डेय

तुमसे ही ये  संसार है माँ 
हूँ दीन -हीन  लाचार  मैं माँ 
तुमसे बंधी  ये प्रीत की डोरी जाये कहाँ हम 
कर  कर दो करम माँ - कर  कर दो करम !

चारो ओर  अंधेर घना  है ,आये नज़र ना उजाला 
ये दुःख  का संसार  है  मईया ,तुम हो दीन दयाला 
कष्ट मिटे ये कैसे करूँ क्या जतन ?
कर  कर दो करम माँ - कर  कर दो करम !
डॉ मुकेश पाण्डेय 



मैं हूँ विद्या विहिन हे माता ,तुम हो ज्ञान विषारद 
तुम्हरी कृपा से ग्यानी बने हैं कबीरा तुलसी नारद 
कर दो हमारी भी सफल जनम 
कर  कर दो करम माँ - कर  कर दो करम !

तेरी कृपा से जड़ और चेतन शेष हो या विशेष 
तू ममता की सागर मईया ,मैं तेरा बेटा "मुकेश "
दुःखों का ये भार  माता करो मेरे कम 
कर  कर दो करम माँ - कर  कर दो करम !