मंगलवार, 1 सितंबर 2015

हई रंगबाज़ साहेब कर तू सलाम - डॉ. मुकेश पाण्डेय

हई रंगबाज़ साहेब कर तू सलाम 
अभी चिन्हत नईख लगले कराईब सलाम 

हमरा से हिले लोगवा जिलवा जवारी में हो 
चले रंगदारी मोरा सउँसे बाजारी में हो 
थाना जेलखाना में ना रुके मोरा काम 

ठाँय -ठाँय मारब गोली भगदड़ मचाईब हो 
कतना बा पावर हमरो अबहीं देखाईब हो 
हाड़वा में जाड होला सुनते ई नाम 

हमरा ई उलिस-पुलिस भिरियो ना ठेकेला हो 
सौ सौ बॉडीगार्ड चलिला नु लेके हो 
हंटर से मारीला त रोवेला लगाम 

हमरा से जीततारें पटिया के नेता हो 
वोट लुटावे ख़ातिर नोट लोग देता हो 
नाम वाला हईं भले होईब बदनाम  


ये सखिया खुलल हमरो क़िस्मत के ताला - डॉ. मुकेश पाण्डेय

ये सखिया खुलल हमरो क़िस्मत के ताला 
नोकरी  वाला मिली ,हमरा बियहवा के हाला 

पाका मुड़ेरा बड़ुवे पटना में डेरा बड़ुवे 
पिया मोरा पुलिस के अफ़सर  कहाला 


ससुर भी शिक्षक बाड़े देवरा पढ़ेला आरे 
धनवा के होला उनके बड़े-बड़े जाला 


आमवा दशहरी फरे हमरा बलमुआ घरे 
दूध दही मक्खन मिसरी आन घरे जाला 

चलो कि लौट चलें छुट्टियाँ तमाम हुई -डॉ. मुकेश पाण्डेय

दिलो-निग़ाह की सरगर्मियां तमाम हुई 
चलो कि लौट चलें छुट्टियाँ तमाम हुई 

न इन्तिज़ार न अब साअतें विसाल की फ़िक्र 
तमाम वक़्त की पाबंदियाँ तमाम हुई 

कभी वो ख़्वाबों का शाहज़ादा आ ही जायेगा 
इस इन्तिज़ार में शाहज़ादिया तमाम हुई 

किसी ने दर्द की दौलत से मालामाल किया 
सो इक उम्र में महरूमिया तमाम हुई 

पसे-निग़ाह करम देखकर मलाल हुआ 
मगर वो रोज़ की हैरानियाँ तमाम हुई 

मुकेश'लौट के जाना भी कब रहा मुमक़िन 
कि जिनसे आये थे वो कश्तियाँ तमाम हुई 

लईका दारूवाला - भोजपुरी मुक्तक - डॉ.मुकेश पाण्डेय

जोर से शोर कके रोज करे हाला 
सांचो ई घर में मचावेला बवाला 
ना ई कमासुत हटे    साला  
सादिक भोजन वाला ना ई ह लईका दारूवाला 


हमरे सईयां हो क देल जवनिया के खून [भोजपुरी लोकगीत ] डॉ.मुकेश पाण्डेय

घरवा कके फ़ोन चली गईले देहरादून 
हमरे सईयां हो क देल जवनिया के खून 

दिनवा ना चैन रतिया निंदियो ना आवेला 
साँचे कहीं सेजिया पिया काटे मोहे धावेला 
का करब आके जब बीती जाई मई -जून 

तित बोली देवरु के लागे जइसे गोली 
छठ आ दशहरा हमके भावे नाही होली 
भरली जवनिया में लागतते घुन 

दिलवा के दर्द जोग कब ले अंगेजी 
नीच उंच बोली सुन के फाटता करेजी 
जरल हमरा देहियां पर लोगवा छींटे नून 

चार सौ के नथुनी किन के बलमुआ [भोजपुरी लोकगीत ] डॉ.मुकेश पाण्डेय

चार सौ के नथुनी किन के बलमुआ बारह सौ के हमके बतावेला 
हमरा के बुझे बुरबक देहाती एही से बुद्धू बनावेला 

कहेला कि देख कर जनि चोना 
हटे ई असली बाईस कैरेट के सोना 
आईल बा छपरा बजारे से लेके दिल्ली के लेबुल लगावेला 

कहेला कि पेन्हला पर लगबु तू रानी 
लागी ई छलकी फेरु से जवानी 
हमके बइठाके अपने हाथे नाकी में हमरा पेन्हावेला