वाया पाण्डेयपुर चौराहा
सोमवार, 20 फ़रवरी 2017
साथ तेरे जो चल रहा हूँ मैं || ग़ज़ल - डॉ मुकेश पाण्डेय
साथ तेरे जो चल रहा हूँ मैं
जाने कितनों को ख़ल रहा हूँ मैं
मेरा शज़रा उठा के देख लो
आबरू-ए -गज़ल रहा हूँ मैं
ये न समझो की गिरने वाला हूँ
एहतियातन संभल रहा हूँ मैं
कल मैं निकलूंगा रौशनी लेकर
ये न समझो की ढल रहा हूँ मैं
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