गुरुवार, 17 सितंबर 2015

रफ़्ता -रफ़्ता रूख़ ये हवा का बता देगा- डॉ मुकेश पाण्डेय

रफ़्ता -रफ़्ता रूख़  ये हवा का बता देगा 
मेरे वास्ते इतना है बहुत 
 हमने तुझे चाहा है बहुत 
तोहे मिल जाये इसकी ख़बरिया 
मोहे लागी रे जुल्मी नज़रिया 
मैं गीर - गीर जाऊं सँवरिया 


जबसे लागे ये मेरे नैन -जियरा का चैन भागे 
तबसे ये नैना लागे 
बहके-बहके हैं मेरे चाल -अबसे जो है ये हाल 
जाने क्या होगा आगे 
मेरी आँखों को है धोखा बहुत 
ज़ख्मो का है अंदाज़ा  बहुत 
उफ्फ़ !मैं कैसी पगली बावरिया 
मो पे डालो ना ऐसे नज़रिया 
मैं गीर गीर जाऊं सँवरिया 


देखो आई है ये बहार ,उसपे तेरा ये प्यार 
कैसे जिया मैं सम्हालूँ 
लाखो में है तू एक पर, ऐसे मुझे ना देख 
आँचल में नैना छुपालूं 
मैं अपनी राय को झुठलाऊं 
और क्या से क्या मैं हो जाऊं 
मुझे खुद भी ना होवे ख़बरिया 
हाय !देखे ये सारी नज़रिया 
मैं गीर-गीर जाऊँ सँवरिया 


तेरा मेरा है जो ये मेल -कई सदियों का खेल 
तू काया मैं तेरी छाया 
तू इन बहारों का है फूल -मुझको ना जाना भूल 
आई हूँ  जब भी बुलाया 
दर्द देने में किफ़ायत कर 
रो दूँ अगर तो हिदायत कर 
इक प्यासी हुई मैं बदरिया 
मोहे लागी रे ज़ुल्मी नज़रिया 
मैं गीर-गीर जाऊं सँवरिया 





















डॉ मुकेश पाण्डेय के भोजपुरी में बाल कविता

ठीक समय पर सुबह-सवेरे 
आ जानी हम रोज    स्कुल 
हर दिन आपन काम करीले 
कबो   करीं   ना  एइमे  भूल 
सब लईकन से  प्रेम  करीले 
इहे   एगो        मोर   उसूल 
अच्छा बच्चा कहे लोग हमके 
हम हईं सबके  आँख के फूल 
हम  मुकेश'के कविता पढ़ के 
रहेनी सबका  से  मिल -जुल 

जवन चाहतारे तेहूँ कर जो रे - भोजपुरी लोकगीत - डॉ मुकेश पाण्डेय

जवन चाहतारे तेहूँ कर जो रे 
ना त डूबी धँसी कहीं मर जो रे 
रुपिया पईसा मँगबे भउजी केहु दे दी पईंचा 
कवन गुजरी दिही रे भतार तोहके पईंचा 

ई कवन लुफत सिखले रे सतभतरी 
छुईयो के लाज ना हाया बाटे कवनो गतरी 
कुल के इज़्ज़त बुझतारे गजरा मुरई ढईंचा 

कहले त कहले दोसरा से जनि कहिहे 
ना त लात मुक्का दोसरा से तेहीं सहीहे 
खईहे ते मुअड़ी के मार हईंचा -हईंचा 

एही ख़ातिर  भेजले भतार का तें बहरा 
तोहपे 'पाण्डेय मुकेश 'से लगवाईब पहरा 
उहे तोर हरिहर रखिहें बाग़ आ बगइचा