गुरुवार, 2 जून 2016

सिग्नल देत बिया छवड़ी लेके हरिहर दुपट्टा - डॉ मुकेश पांडेय

आईल बिया हितई घूमे रहेले शहर टाटा 
सिग्नल देत बिया छवड़ी लेके हरिहर दुपट्टा 

चान खानी चमकतिया दुधवो से गोर हो 
गउवा में होत  बाटे एकरे नु  शोर हो 
देखि  सुरतिया दिल में गड़तावे कांटा 
सिग्नल देत बिया छवड़ी लेके हरिहर दुपट्टा 

चढ़ जाले छत पर केशिया के झारे 
अपना सुरतिया के खुबे संवारे 
एकरा कठरा में जाने के सानी  आंटा 
सिग्नल देत बिया छवड़ी लेके हरिहर दुपट्टा 

पाण्डेय मुकेश "नईखे काबू हो मन पर 
ना जाने केकर हक़ बावे एकरा धन पर 
बोलेला केहू त देखावेले चाटा 
सिग्नल देत बिया छवड़ी लेके हरिहर दुपट्टा 


भगवान हमके काहे ना मुरलिया बनवलें तोहार - डॉ मुकेश पाण्डेय

भगवान हमके काहे ना मुरलिया बनवलें तोहार 
तोहरा ओठवा से सट के छुवतीं ओठवा तोहार 
ईहे मन करेला हमार 

मिलन के बिना तरसे नयनवा तड़प रही हूँ बरसाने में 
गज़ब के क़िस्मत बा मुरली के मगन हुवे हो बजाने में 
प्यार के बिना तरसता सगरो सिंगार 
दिल धड़क रहल बा हमार 

खनकता चूड़ी सहे ना दुरी ये हो पिया तुम कहाँ हो 
चाहिले तोहके रब से भी ज़्यादा ख़ुश रहो जहाँ हो 
खोजेला  ई  अँखिया करे के दीदार 
आ जईता यमुना किनार