शनिवार, 12 सितंबर 2015

हम अकेला बानी आवाज़ दित केहु [भोजपुरी ग़ज़ल ]- डॉ. मुकेश पाण्डेय

बेरोज़गार के काज दित केहु 
हम अकेला बानी आवाज़ दित केहु 

बहुत सन्नाटा बा इहाँ पर 
काश ! तूफ़ान उठा दित केहु 

जे चहले रहे हमें पहिले -ओहिले 
ओ बेदर्दी के पता दित केहु 

जवना से टुटित हमार प्रेम के भरम 
हमके अईसने सज़ा दित केहु 

रात जब सूत जाले हम जागिले 
उनके जाके ई बता दित केहु 

जे हमरा लगे बा आ दुरो बा 
के लेखा उनके भुला दित केहु 

प्यार के रंग लेके घुमतानी 
उनकर फ़ोटो बना दित केहु 

दिल के खरिहान में लुत्ती लुकाईल 
अपना ओढ़नी के हवा दित केहु 

मुकेश'फूल फेर से घाव बनल 
फेर पतझर के दुआ दित केहु 

तू चल अभी - - डॉ. मुकेश पाण्डेय


तू चल अभी...

तू चल,
कि तेरी हथेलियों को बहुत से,
पत्थर निचोड़ने है ।

तू चल अभी,
कि तेरी बेबसी को बहुत से,
कानून तोड़ने है ।

सहेगी तू,
अत्याचार कब तक,
करेगी यु ही,
विचार कब तक,
कटेंगे तेरे,
पंख यु ही कब तक,
टूटेंगे सपनो के,
शंख  कब तक,
ठगेगा तुझे,
समाज कब तक,
लुटेगी तेरी,
लाज कब तक,

जो भय है,
उसको तू क्रोध कर दे,
विवशता का अब,
विरोध कर दे,
मिलेगा किस तरह,
न्याय तुझको,
ये ढूंढ़ना है,
उपाय तुझको,

कठोर अग्नि-परीक्षा,
कब तक चलेगी,
तू एक,
चिता की तरह,
बता कब तक जलेगी ?
तू धूल को अब,
गुलाल कर दे,
समय के सूरज को,
लाल कर दे,

जो ज्योत  मन में,
दबी-दबी है,
उसे  जला कर,
मसाल कर दे,
जो तेरे,
अस्तित्व को नकारे,
वो पुस्तकें ,
आज फाड़ दे तू,
जिसे उखाड़े,
न कोई आंधी,
शिखर पर वो सूल,
गाड़ दे तू,

तू चल ,
कि तेरी हथेलियों को बहुत से,
पत्थर निचोड़ने है ।

तू चल अभी,
तेरी बेबसी को बहुत से,
कानून तोड़ने है ।

ओसिया में बदरी बदरिया में जाड़ बा - डॉ. मुकेश पाण्डेय

ओसिया में बदरी बदरिया में जाड़ बा 
सूत जा बलमुआ अंचरवा के आड़ बा 

एतना कुहेस बा कि केहु ना चिन्हाई 
लगवे पटाईल रह देंहिया दनाई 
केहु ना चिन्हाला दुअरा भसुरा भी खाढ़ बा 

डहरी  में आँखी एने - ओने तू गड़ईब 
डर बा की नए गाड़ी असवो लड़ईब 
सोचतानी हमरो जवनिया पहाड़ बा 

अईल ह त रात भर साथे साथे रह 
दुःख सुख सुन हमार अपनों भी कह 
देंह में दरद बा कमाई  तोहर डांड़ बा 

छव छव महीना पर घरे जो तू अईब 
सुब्हा हमार सईयां अउर तू बढ़ईब 
जानेनी मुकेश" तहार बहरो जोगाड़ बा 

हमरा जिए के बढ़िया जोगाड़ हो गईल - डॉ. मुकेश पाण्डेय

मुक्तक : एनियो जवानी बा ओनियो जवानी 
              भला कईसे दुनो मिले बिना मानी 
             इहे बात हमरो पर लागू भईल 
             आ अइसने बनल कुछ हमरो कहानी 

जेकरा घर में किराया पर रहत रहीं 
ओ घर वाली गुजरिया से प्यार हो गईल 
दिल के बात दिल से कहाये लागल 
हमरा जिए के बढ़िया जोगाड़ हो गईल 

ओहिजा लिहनी कोठरिया हम ओकरे बदे 
एक बेर देख लिहीं त किराया सधे 
पहिले अँखियन से अँखियन में बतिया भईल 
फिर धीरे धीरे उ हमार हो गईल 

हम नीचे रहीं उ त ऊपर रहे 
ओने गंगा बहे एने जमुना बहे 
 एक दिन दुनो नदियाँ के संगम भईल 
फिर त जिनगी हमार गुलज़ार हो गईल 

प्यार के गंध पुरुआ के साथे बहल 
ओकरा माई आ बाबू के पाता चलल 
पहिले परिवार ओकर कईलस बवाल 
पाछे अपने से उ त इयार हो गईल 

लागे हमरा त सरग भेंटा गईल बा 
कवनो सिकिया शरीरिया मोटा गईल बा 
रहे कुछुवो बनावत चिखावत रहे 
प्यार में ई बेसुर लयदार हो गईल