मंगलवार, 15 सितंबर 2015

जनि जाईं ओने ऊ गली बदनाम बा - डॉ मुकेश पाण्डेय

जनि जाईं ओने ऊ गली बदनाम बा 
गछिया पोखरिया हर कली बदनाम बा 

ओने एगो कोठा ऊपर नाचेले नचनिया 
पईसा लेई बनेले ऊ रात भर के कनिया 
लोर पी के हँसे ऊ पगली बदनाम बा 

एके बा परिचय उँहा माई बहिन बेटी 
एक दूसरा के सोझा जाला सभे लेटी 
ओ गोदिया में जे भी पली बदनाम 

जवने भी होला उँहा होखे सब रात के 
काश केहु खोजित इतिहास ये श्राप के 
काहे उँहा जिनगी अतना भली बदनाम बा 

केतना जतन से पिरितिया संवरनी - डॉ मुकेश पाण्डेय

केतना जतन से पिरितिया संवरनी 
सनेहिया हो टूटी गईले  अचके हमार 

मनवा के बतिया अंटकी गईले ओठवा 
सनेहिया हो दरद मिलल बेशुमार 

जिनगी के मरम समझ में न आवेला 
जेतने समझिले ओतने अझुराला 

अनबुझ जिनगी के अनबुझ बतिया 
सनेहिया हो टूटी गईले अचके हमार 

कागा उचार पिया अइहें कि ना रे [भोजपुरी गीत ] डॉ मुकेश पाण्डेय

कागा उचार पिया अइहें कि ना रे 
ठोकी ठोकी हमरा के सुतइहे कि ना रे 

हमरो बलम के अरब के नोकरिया 
लेबो ना कइलें उ खोजिया ख़बरिया 
पटना के टिकट कटइहें कि  ना रे 

सहलो ना जाला सजन के जुदाई 
केतना दरद होला कईसे बताईं 
नेहिया के कथवा सुनइहें कि ना रे 

सरसो के फूल लेखा देंह पियराता 
दिनवा गिनत गिनत अंगूरी खियाता 
पतझड़ बसंत बनइहें कि ना रे 


जाईं जाईं हम जान गईनी [भोजपुरी ग़ज़ल ] डॉ मुकेश पाण्डेय

जाईं जाईं  हम जान गईनी 
रउरा का चीज़ हईं पहिचान गईनी 

तबहुँ जीयतानी ई अजीब बात बा 
रउरा कबसे लेके हमार जान गइनी 

रउरा आईल रहनी जहिया हमरा घरे 
हमार ओहि दिन से लेके ईमान गईनी 

जवना जगहा सुरुज भी पहुँच ना सकस 
मुकेश पाण्डेय' हम होके इंसान गईनी 

आधा जिनगी मरे मारे में गुजरी [भोजपुरी ग़ज़ल ] डॉ मुकेश पाण्डेय

आधा जिनगी मरे मारे में गुजरी 
बकिया परलोक सुधारे में गुजरी 

बाप मतारी लईका फईका धरम करम 
सगरो उमिर क़र्ज़ उतारे में गुजरी 

दू क़दम के साथ देके चल  जइब तू 
बक़िया राह तोहके बिसारे में गुजरी 

रात भर झरी ईयाद के पतई 
दुपहरिया ले आँगन बहारे में गुजरी 

जमाना के चमक दिल के रास नईखे आवत - [भोजपुरी ग़ज़ल ] डॉ मुकेश पाण्डेय

जमाना के चमक दिल के रास नईखे आवत 
हमार जिनगी गुज़र गईल एमे शहर बसावत 

हालत हमरा दिल के कह  हमके के बताई 
हम खुद में ही कई रोज से पहुँच नईखीं पावत 

दुनिया के तक़लीफ़ के मन बा पिरोई ग़ज़ल में 
एकरा अलावा हमरा कवनो काम नईखे आवत 

घर के ना अच्छा लागे हमार आवारा-मिज़ाजी 
ना जाने कहाँ-कहाँ बिया रात ई घुमावत 

आव तू हमरा कोरा में बितावे ख़ातिर रात 
ढेर दिन हो गईल बा तोहके सीना से लगावत 

दिल तोहसे जुदा हो के भी वीरान ना भईल 
तहार याद घर बना के एमे जिनगी बा बितावत 

दिन केतना बीत चुकल बा एकर ख़बर भी नईखे 
केहु काहे नईखे जा के सुरुज के जगावत 

मुकेश पाण्डेय "शायरी में ताज़गी लियाव 
कहिया ले घुमब ग़ालिब के दीवान उठावत 

पांच मुक्तक - डॉ मुकेश पाण्डेय

कवन मज़ा बा ओह गली में देखे नाहीं पईनी 
हम पहिले त बुझत रहनी स्वर्ग में भी कुछ बा 
दारू में त मजे मज़ा  बा जब भी पियले बानी 
तू कहेल छोड़ द पियल तहरा संघत में कुछ बा 

बेरोज़गारी फईलल बा पढ़लो लिखला के बाद 
कतहुँ केहु में कहाँ बा बात करे के लूर 
कवलेज में त धूम मचल बा 'पास-पास' के 
नोकरी माँगे जा त अफ़सर कहे 'दूर-दूर '

हिन्दू- मुस्लिम में हिन्द के नेव भी बा 
अफ्तार में खजूर बा त सेव भी बा 
'अल्लाह-अल्लाह' मियां लोग कहे बेशक 
लेकिन एगो रंग 'बम-महादेव ' भी बा 

हिन्दू-मुस्लिम दुनो एके 
यानी दुनो हवे एशिआई 
एकदेश एकबोली एकेकिस्मत 
काहे नईख कहत कि ह भाई-भाई 


एको रत्ती ऊ ना करीहें मरव्वत 
ऊ अपना रुख से मुंह नाहीं मोड़िहें 
जमराज कहीं जान बक्सीयो देवे पर 
डागडर साहेब एको आना फ़ीस नाहीं छोड़ीहे 
















डॉ मुकेश पाण्डेय के भोजपुरी दोहा

प्यार हवे ना युद्ध हिंसा प्यार ना ह हथियार 
प्यार के आगे झुक गईल केतना केतना सरकार 
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प्यार कृष्ण के रूप ह जेके भजस रसखान 
प्यार जेईके मिल जाला उ बन जाला इंसान 
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प्यार हृदय के पीर ह प्यार नयन के नीर 
ढाई आख़र प्यार ह कहलें संत कबीर 
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प्यार ना बुझे छल कपट चोरी झूठ भा लूट 
प्यार पवित्र रिश्ता अमर जेकर डोर अटूट 
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प्यार में ओझल चेतना प्यार में गाएब चैन 
प्यार अश्रु अविरल विकल जेइमे भींजे नैन 

तीन गो भोजपुरी मुक्तक -डॉ. मुकेश पाण्डेय

ज़बान से बोली भा नज़र से बोली 
हमार वज़ूद हमरा हुनर से बोली 
कलम कलम ह कलम के ज़बान ना होला 
कलम के दरद तहरा ख़बर से बोली 


चलत रहल बहुत ज़रुरी बा 
दिल के कहल बहुत ज़रूरी बा 
देख सागर बन जाई आँसू 
एकर बहल बहुत ज़रूरी बा 


शहर आँख में समेटता 
स्वार्थ के परत लपेटता 
छोड़ बूढ़ माँ-बाप के कोठरी में 
मेहरारू संघे बेटा लेटता 

तब काहे उदास बाड़ [भोजपुरी ग़ज़ल ] - डॉ. मुकेश पाण्डेय

तू हमरा आस-पास  बाड़ 
तब   काहे    उदास   बाड़ 

बात करेल मरे जिए के 
तू   बिखरल एगो आस बाड़ 

हमहुँ डूबल बानी आसमान में 
तू  काहे    निराश बाड़ 

हम हईं टूटल पैमाना 
तू ख़ाली  गिलास बाड़  

हम दुःख से बानी सजल 
रंज के तू लिबास बाड़ 

अपना फ़ितरत के हम मारल 
अपना आदत के तू दास बाड़ 

उनकर ईयाद बिसरत नईखे [भोजपुरी ग़ज़ल ] - डॉ. मुकेश पाण्डेय

उनकर ईयाद बिसरत नईखे 
ज़ख्म ठीक से भरत   नईखे 

कई बरिस के साथ छूट गईल 
उमड़ल दरिया बन्हत  नईखे 

हमके   उदास  रहे  द   अभी 
हवा एह्सास के बहत नईखे 

जे हमार दुनिया  उजड़लस   
उहो   कहीं   बसत    नईखे 

तू चाह  त   लवट   सकेल
तोहके केहु रोकत  नईखे 

शब्द के अर्थ से परे जाईं 
 ई हमरा से होखत नईखे  

बात हम सीधा-साधा कहिले 
लोग के पाले पड़त नईखे