रात हो गईला पर
एह लोग के देह में फुलाला हरसिंगार
जवन सवेरे
एगो उदास सफ़ेद चादर में तब्दील हो जाला
एह लोग के तहख़ाना में
पनाह लेला
ओ कुलीन औरत के स्वप्न-पुरुष
जेकर बद -दुआ के
अपना रक्त से ई लोग पोसेला
ये लोग के कमर आ जांघ में
कबो दरद ना होला
आ कान्हा निढ़ाल ना होला कबो थकान से
एह लोग के स्तन पर
दांत आ नोह के निशान
कबो ना पावल जाला
पढ़ल लिखल होखे के कवनो भी
सबूत दिहला बिना
ई अपना विज्ञान के
कला में बदल देवेला
ई आज भी
दस बीस रूपया में
बाज़ार कके लवट आवेला लोग
भगवान जाने
एह लोग के चाचा ,दादी आ दीदी के
दोकान कहाँ लागेला
अपना जनम के स्मृति के
ई लोग कर देला तर्पण
आ मृत्यु के बारे में
एह से ना सोचेला लो
कि हर चीज़ सोचला से ना होला
प्रेम मृत्यु ह
एह बदनाम अवरतन ख़ातिर