गुरुवार, 27 अगस्त 2015

कुछ ऐसे पथराव हुवे है


वाया पाण्डेय पुर चौराहा

डॉ.मुकेश पाण्डेय

घाव के भीतर घाव हुवे हैं

  Wednesday August 26, 2015  

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कुछ ऐसे पथराव हुवे है 
घाव के भीतर घाव हुवे हैं 

हर आहट  पहले जैसी है 
चीख में बस बदलाव हुवे हैं 

महंगाई के महासमर में 
सबके ऊँचे भाव हुवे हैं 

बेपरवाह भाई से भाई 
रिश्ते सर्द अलाव हुवे हैं 

समय की गुथ्थी सुलझाने में 
और अधिक उलझाव हुवे हैं 

मिल जुल कर बोलें -बतियाएँ 
दिल पर बहुत दबाव हुवे हैं

पराजय - डॉ.मुकेश पाण्डेय

वे बेचारे एक अध्यापक 
जिंदगी भर नैतिक शिक्षा का पाठ 
सबको सम्मान दो
 कभी झूठ मत बोलो 
कभी गलत मत करो 
और भी न जाने क्या-क्या 

और फिर उस ज़माने का माँगे राम 
उन्हीं की कक्षा में पीछे बैठा 
ऊँघता      मारते मास्टर जी 
आज चरणों में सर के साथ 
बहुमूल्य शॉल 
छड़ी को सर आँखों पर लेते हुवे 
गुरु जी   नमन आपकी उस शिक्षा को 
जिसका विरोध करते-करते 
सब कुछ पाता हुआ 

ये दुनिया मेरी है 
और   वे बेवस से 
देखते हुवे उस ओर 

माँ रउरे हईं रुद्रा भवानी - [भोजपुरी देवी गीत ] - डॉ.मुकेश पाण्डेय

रउरे हईं शक्ति-स्वरूपा ,माँ रउरे हईं रुद्रा भवानी 
दुर्गम रूप बा राउर ,एही से रउरा दुर्गा कहानी 

काली भद्रकाली महाकाली मुण्डमाली 
यम  नियम           सत्य संयम वाली 
रउरे से जीव जंतु प्राणी,माँ रउरे हईं रुद्रा भवानी 


ज्ञान विज्ञान ' ध्यान दिही  ये माई 
मान सम्मान स्वाभिमान के बढ़ाई 
हम बानी मूरख अज्ञानी ,माँ रउरे हईं रुद्रा भवानी 

पाण्डेय मुकेश' आ दिवेश' के क्लेश के 
दूर करीं कष्ट       एह भारत देश के 
करेला विधर्मी मनमानी ,माँ रउरे हईं रुद्रा भवानी 



दीवाने हम है मुरलिया के - डॉ.मुकेश पाण्डेय

तेरी  राह जोहे राधा गोरी 
वो तो आई है चोरी चोरी 
कहाँ करी देर सांवरिया रे 
तुझे मालूम नहीं है क्या ?
                  दीवाने हम है मुरलिया के 

आई पूनम की रात सुहानी प्रीत की बजे शहनाई 
काली घटा फिर घिर आई है चले पवन पुरवाई 
आजा आजा रे कुँवर कन्हैया 
मेरी पार लगदे तू नैया 
कि तुझको ढूंढ़े नजरिया रे 
तुझे मालूम नहीं है क्या ?
                  दीवाने हम है मुरलिया के 

आज बाल दिवस हैं - डॉ मुकेश पाण्डेय

आज बाल दिवस है 
खुश होने का दिन 
उत्सव का 

एक आयोजन का 
देश में विदेश में 
यहाँ भी वहां भी 
मैं भी खुश हूँ 

मुझे कुछ  लिखने को मिलेगा 
नेता भी खुश हैं 
उन्हें कुछ बोलने को मिलेगा 
और खुश हैं वो बाल  मज़दूर  भी
उन्हें 'बाल  दिवस' के पोस्टर चिपकाने 
का काम मिलेगा 
शायद उन्हें यही पता है इन दो शब्दों का 
कि -इस दिन उनके घर चूल्हा ज़रूर जलेगा 
ख़ाली नहीं बैठना होगा 

अचानक मेरे बराबर से गुजर जाती है 
सायं से कई गाड़ियाँ 
उस जगह जहाँ भाषण होना है 
जिस जगह नेताओं को मगमच्छी आंसू रोना है 
और बाल दिवस की मूल परिभाषा को 
झूठे वादों में खोना है 
मैं भी लगभग भागता हूँ उस तरफ 
जहाँ नेताजी एक बच्चे को गोद में उठाये हैं 
लेकिन बच्चे की आँखों में असमंजस है 
गोद से उतरने की अकुलाहट ,

उसे शाम को पूरे पैसे नहीं मिलेंगे
 क्योंकि उसने अभी आधे पोस्टर ही चिपकाये हैं 
लेकिन कौन सुने उसकी
कौन है जिससे कहे वो दिल की बात 
नेता जी दिल खोलकर माइक पर चीख रहे हैं 
लोग खुश हो-होकर ताली पिट रहे हैं 
पत्रकार धड़ाधड़ फ़ोटो खिंच रहे हैं 
हर किसी का यही स्वार्थ होगा शायद 
उस बच्चे को 
गरीबी की ,अशिक्षा की 
और जुर्म की सौग़ात 

अचानक उस लड़के के चेहरे पर रौनक़ आती है ,
क्यूंकि उसे आजादी मिल गयी है 
लोगों के अंतर की जो काली रस्सी थी 
उससे मुक्ति मिल गयी  
वो लगभग भागता हुआ सा 
सर पर पोस्टरों के गठ्ठर को रखकर
कुछ हड़बड़ाहट कुछ परेशानी और कुछ सोच में 
उसे तो इन सबको जल्दी से जल्दी चिपकाना है 
नहीं बैठना है थककर 
उस मासूम को गुस्सा आ रहा हैं 
उस भीड़ पर ,उन नेताजी और उस व्यवस्था पर 
इस वजह से नहीं कि वे सब झूठे हैं 
फ़रेबी हैं मक्कार हैं 
बल्कि इस वजह से 
की अगर वे नहीं रोकते उसे तो 
चिपक  जाते अब तक सारे पोस्टर 

इस वक़्त वो केवल 
पोस्टर चिपकाने  में खोया हुआ है 
उसे कुछ नहीं पता 
कुछ लेना देना नहीं इस बात से 
कि सरकार क्या है 
व्यवस्था क्या है 
अनीति क्या है 
और  भ्रष्टाचार क्या है 
उसे उस पैसे से क्या वास्ता 
जो कागजों में उसके नाम लिखा हुआ है 
जब कि हक़ीक़त में 
नेताओं और सरकारी 
कर्मचारियों 
का ही भला हुआ है 
वो तो किसी और ही दुनिया में गुम है 
पुरे पोस्टर चिपकेंगे 
कुछ पैसे मिलेंगे 
कुछ सामान आएगा 
उसमें  होगा 
आटा -दाल -मसाला 
और क्या होगा 
और हाँ किताब भी तो 

लेकिन वो कैसे ?
माँ की दवा 
अवसाद से भरा मन 
हाथों में धीमापन 
आँखों में धुंधलाहट -चमकीला भविष्य 
वो चुपचाप -हाथ रोककर 
खड़ा हो कर 
एक हाथ में चंद बचे पोस्टर 
और एक में बाल्टी में कूंची डाले 
देखता है चारों ओर 

कुछ नहीं है 
अगर है तो वो अकेला 
साथ में ये हवा  धूप 
ये धरती ये आसमाँ 
वो चल देता है ख़ामोशी  से 
सर को झटककर 

अंतिम पोस्टर को स्कूल की दिवार 
के पीछे चिपकाता हुआ 
झाँकता है वो क्लास में 
उस खिड़की से पढ़ाता हुवे मास्टर को 
पढ़ते हुवे बच्चे को 
मूक खड़ा देखता रह जाता है 
और सोचता है 

क्या ये आसमान से उतरे हैं 
नहीं नहीं  हैं तो यही के 
लेकिन पढ़ लिख कर 
आसमान को ज़रूर छुवेंगे 
उसे भी ललक है 
उन काले काले से खूबसूरत 
अक्षरों को पढ़ने की 
बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताओं में लड़ने की 
लेकिन वो सब ख्वाब है 
ये सब हक़ीक़त है 
वो सब यहीं देखते रहने को विवश हैं 
खामोश हैं 
वो पागल है 
शायद 
उसे हंसना चाहिए 
जानता  नहीं कि  आज बाल दिवस हैं 

































































मैं तो केवल एक लेखक हूँ - डॉ मुकेश पाण्डेय

मैं कोई इतिहासकार नहीं हूँ
मैं तो केवल एक  लेखक हूँ
जो याददाश्त से ग्रस्त हूँ
उससे भी अधिक भारत की यादों से ग्रस्त
वहीं बिहार जो हमारी प्रिय धरती है
पर वह स्मृति लोप से दण्डित है

अब फिर वहीं से शुरू करता हूँ - डॉ मुकेश पाण्डेय

अब फिर वहीं से शुरू करता हूँ 
जहाँ से चीजों की सही शक्ल 
ओझल होनी शुरू हो जाती है 
अपने ही आस पास बने हुवे जाल में 
नज़र डूब जाती है 
छोटी बड़ी उलझनों के गुथ्थीदार अंधेरों में 
भटकते हुवे 
मैंने समझा था 
कि  दुर्गम पर्वतों से जूझ रहा हूँ 
हर बार टकरा कर 
कुछ कदम आगे बढ़ता जा रहा हूँ 
पर फिर मैंने जाना 
कि अँधेरे के पर्वत और बड़े हो कर 
मुझसे बहुत आगे निकल गए हैं,
इस शापित व्यवस्था पर 
रोम-रोम फ़ैल गए हैं 
और मेरे कदम 
जहाँ से चले गए थे 
वहीँ रह गए हैं 
यह विफलता नहीं 
वक़्त की गहरी उदासीनता में 
अकेला हो जाने का एहसास भारी  हैं 
उन धड़कनो से मिलकर मजेगा मिटेगा 
जहाँ हर मन है कुरुक्षेत्र 
युद्ध अभी जारी है 

यह सही है 
की मेरे शब्द के आकाश में 
अब भी अक्सर गरम बिजली कौंध जाती है 
हर फरेब की जकड़न को 
थोड़ी देर रौशनी में नंगा कर जाती है 
             मेरे पास सिर्फ शब्द है 
            जो समय के अस्त्र हैं 
इन अस्त्रों की धार बचा चमकदार रखना है 
क्यूंकि चारों तरफ आज बड़े चालक शब्द हैं 
जो भीतर से जंग लगे हैं 
बाहर से चुस्त हैं 
उन शब्दों को बेनक़ाब करना है 
            इनका तेवर तेज तीखा है 
            भीतर समझौता है ,
            सुरक्षित कायरता है  
            असलियत पर मुखौटा है 
ये चतुर शब्द 
वक़्त में मुताबिक करते अर्थों की चोरिया 
पर ऐसे में कौन रह सकता है आरक्षित 
जब आदमी पर गिरती हो चौतरफ़ा बिजलियाँ 
लोग कहते हैं 
जो तुम नहीं हो 
वह होना अब मुश्किल है ,
जो छूट चुकीं राहें उन्हें पाना बहुत मुश्किल है 
पर आदमी अपने से ही होता परास्त है 
मजबूरियों की बात सिर्फ़ होती बहाना है 
दुनिया को धोखा देना है 
मन समझाना है 

मैं वक़्त के सामने 
शब्द-दर्पण के सामने 
पूरा अपने ही पास हूँ 
यह अकेलापन एक नयी तरह की चुनौती है 
जो आदमी को सही नाम देने की 
पहचान मुझे देती है 

इसलिए अब फिर वहीँ से शुरू करता हूँ 
जहाँ से चीजों की सही शक्ल 
साफ दिखने लग जाती है 
जब अपने से बड़े दुःख की आवाज़ 
शब्द में उतर  जाती है 










































भोजपुरी मुक्तक [4 ] डॉ मुकेश पाण्डेय

हमरा घाव से तनी अउरी खेल 
अभी त सउंसे रात बाक़ी बा 
जिनगी ख़तम हो गईल लेकिन 
जिए के चाह अभिन बाक़ी बा