रविवार, 16 अगस्त 2015

क्या क्या न सितम हाय ये ढाती हैं चूड़ियाँ - डॉ. मुकेश पाण्डेय

क्या क्या न सितम हाय ये ढाती हैं चूड़ियाँ
बेशर्म हैं कुछ ये न लजाती हैं चूड़ियाँ
बातें हो छिपाने की बताती हैं चूड़ियाँ
जब भी किसी कलाई में आती हैं चूड़ियाँ


काली जो चूड़ियाँ थी पुतलियों में ढल गयी
नीली जो चूड़ियाँ थी नसों में बदल गयी
पीली जो थी चेहरे पे नूर सी बिखर गयी
जो लाल थी रगो में वो ख़ून बन गयी
रग -रग  में ऐसे दौड़ लगाती हैं चूड़ियाँ


इक दिन की बात जो कभी भूली न जाएगी
सखियों ने कहा कल तेरी बारात आएगी
माँ ने कहा बेटी मेरी ससुराल जाएगी
किसको पता था सबको ये चूड़ी रुलाएगी
अपनों को भी पराया बनाती है चूड़ियाँ


सुन ले जो खनक इसकी वो नाक चढ़ाये
बूढ़ी जेठानियों को सांप लोटता जाये
देवर जो सुने छेड़ के बोले वो हाय-हाय
सुन के ननद वक़्त के पहले ही घबराये
ससुराल में यूँ आग़ लगाती हैं चूड़ियाँ













अब के साल सावन में जब घटाएं छायेंगी - डॉ. मुकेश पाण्डेय

अब के साल सावन में जब घटाएं छायेंगी
हम भी अपने हाथो से मैकदा सजायेंगे 
तेरी याद के सागर दोस्तों से टकराकर 
बेवफा ये सोचा है हम तुझे भुलायेंगे 


हमको आश्ना कहदे अहदे दिलरुबा कहदे 
बेरूख़ी से अच्छा है हमको तू बुरा कहदे 
तुझसे प्यार करते हैं हम भी तुझपे मरते हैं 
हम भी हाथों से तेरी आरती उतारेंगे 


तू ही मेरी मंज़िल है मेरी जां  मेरा दिल है 
जिन्दगी समन्दर है और तू ही साहिल है 
प्यार की कहानी है मेरी जिंदगानी है 
पी के तेरी आँखों से हम भी लड़खड़ाएँगे 

तुम से हम रूठकर अब किधर जायेंगे - डॉ. मुकेश पाण्डेय

तुम से हम रूठकर अब किधर जायेंगे
ग़म में डूबे रहेंगे या मर जायेंगे
अब तो भाता नहीं ये विरानापन
अब तो साये से भी हम डर जायेंगे


वस्ल की आरज़ू अपने दिल में लिए
जबकि अपना तुम्हे हम बना ही लिए
ये दिल मेरा तड़प रहा एक ज़माने से
आ भी जाओ सनम तुम बहाने से
मैं मिलूंगा वहां वो जिधर जायेंगे


जिन्दगी इस जहाँ की फ़क़त चार दिन
कैसे बीतेगी रातें सनम तेरे बिन
काट कर मांगते हैं वो बाजु मेरा
फ़िर भी वो कहते नहीं तुम हो मेरा
उनके कदमो में लेके हम सर जायेंगे


है तकलीफ़ मुझे अब ज़माने से क्या
ज़िन्दगी तेरे कदमो में आने से क्या
कर दिया हालत ने रुस्वा बहुत
आदमी था बात का सच्चा बहुत
देखके तुझ को हम लड़खड़ा जायेंगे

श्री गुण कमलानने - डॉ. मुकेश पाण्डेय

शतनाम प्रक्ष्वामी ,श्री गुण कमलानने
यस्य सस्य दुर्गा सती प्रीता
अनन्ता भवानी , श्री गुण कमलानने


साध्वी सती भवप्रीता भवानी
आर्यदुर्गा चन्द्र घंटा महारानी
चित्तरूपा चितिदानी ,श्री गुण कमलानने


आदि अनादि अनामय अविनाशी
अमल अनंत अज आनंद राशी
महिषासुर नाशिनी ,श्री गुण कमलानने


तवापर्णे कर्णे  विशति मनुवर्णे
निरतंको रंको विहरति हर्णे
मदियोग्यं त्यागिनी ,श्री गुण कमलानने

रात दिन बम बम बोले {भोजपुरी काँवर भजन }डॉ. मुकेश पाण्डेय

हमार सैयां जी हमार राजा जी 
जब से खइले ह भंगिया के गोले 
त  रात दिन बम बम बोले 
चलस रहिया में उ त हौले-हौले 
त  रात दिन बम बम बोले 


एक त  भक्तन के भीड़ बाटे भारी 
कईसे  इनके अकेले सम्हारी 
पंडा मन्दिर के गेट नाहीं खोले 
त  रात दिन बम बम बोले   


छीन के इनका से रहनी ह धईले 
जाने केकरा से मांगी के खइलें 
गांजा पी -पी के भइलें बकलोले 
त  रात दिन बम बम बोले 


पाण्डेय मुकेश"तू ही समझाव 
कसहुँ मन्दिर में इनके पहुँचाव 
हमार सैयां जी मस्ती में डोले 
त  रात दिन बम बम बोले 

जय हे कामाख्या जय कल्यानी {भोजपुरी देवी गीत } डॉ. मुकेश पाण्डेय

जय जगजननी हे जगता भवानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी

तू विंध्याचल देवी कामरूपा
अष्टभुजी तू ही रूद्र स्वरूपा
तू ही सिद्ध मईहर की महारानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी


धाई पवन हंसी चंवर डोलावे
सुरुज किरिनियाँ श्रृंगार सजावे
चरण पखारे नित गंगा के पानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी


चम-चम माथे मुकुट मणि सोहे
रूप सुघर तोरी छवि मनमोहे
दर्शन पा के सब पाप नसानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी


वेद पुराण ग्रन्थ गुण गावे
पाण्डेय मुकेश" भी ध्यान लगावे
जपत निरंतर संत ज्ञानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी















कि देवी मोरी खोली ना केवाड़ {भोजपुरी देवी गीत } डॉ. मुकेश पाण्डेय

हम बानी ठाढ़ि दुवरिया
कि  देवी मोरी खोली ना  केवाड़ 

एक हाथे फुलवा-दूसरे हाथे झुलवा
लाली चुनरिया लहराय
लिहले सेनुरवा- सिन्होरवा  
कि  देवी मोरी खोली ना  केवाड़    


चनन अक्षत रोरी -घियना के दियना
ढरके अंसुईया के धार
हम करबो तोहरो सिंगरवा
कि  देवी मोरी खोली ना  केवाड़ 


सबका के तरलु मईया -पाप ताप हरलू
दिहलू सरनिया के छाँह
हमरो बा तोहरे असरवा
कि  देवी मोरी खोली ना  केवाड़  

दक्षिणा संकल्प क्या है -पूछते सब :- डॉ. मुकेश पाण्डेय

यह धनुष तो वज्र के जैसा बना है 
टूटता ही नहीं 
फिर -फिर लौटते हैं जनक 
असफ़ल थके-हारे 
सिर झुकाये स्वयं से संवाद करते 
पूछते क्यों बेअसर हो गए फिर से शगुन सारे 
लिए वंदनवार मालिन 
राह में मिलती कभी जब 
दृष्टि धरती पर गड़ाए 
बहुत तेजी से निकलते 
और सखियाँ लौटती  ससुराल से जब 
माँ बहुत उद्विग्न रहती उन दिनों है 
आँख में आँसू मचलते 
पस्त होते हौसलों में भी 
निकल पड़ते हैं पिता फिर 
एक टूटी नाव 
पर तूफान में किसको पुकारें 
रूप ,रंग ,कद आयु ,शिक्षा ,कुण्डली ,कुल 
दक्षिणा संकल्प क्या है -पूछते सब 

बोल ! काहो ईहे बात ह ? {भोजपुरी गीत }- डॉ. मुकेश पाण्डेय

चुम्मा देके भरमाई -कहलू आवतिया माई
प्यार कईला के इहे सौग़ात ह
क्षण भर के कवन मुलाक़ात ह
बोल  ! काहो  ईहे बात ह ?


पहिल के अब छोड़ बात नईखी जा नादान हो
आव खुल के माजा लिंजा भईनी जा जवान हो
का तू चाहतारु बोल-गेट दिलवा के खोल
धोखा ताव  पर दिहल ही त घात ह
क्षण भर के कवन मुलाक़ात ह
बोल  ! काहो  ईहे बात ह ?


चुपे चोरी चलत रहे भईल खुलेआम हो 
तहरे पीछे भईनी हम त दुनिया में बदनाम हो 
आदत देखि के तोहार -जिया जरेला हमार 
काहे कहेलु तू  दिनवा के रात ह 
क्षण भर के कवन मुलाक़ात ह
बोल  ! काहो  ईहे बात ह ?


करे के नईखे प्यार गोरी त कही द  तू साफ हो
चुम्मा एगो पूरा देलू एगो देलू हाफ़ हो
कहे पाण्डेय मुकेश"-इहे बात हरमेश
आख़िर केतना तोहार औक़ात ह
क्षण भर के कवन मुलाक़ात ह
बोल  ! काहो  ईहे बात ह ?








कुछ ऐसे पथराव हुवे है {ग़ज़ल }-डॉ. मुकेश पाण्डेय

कुछ ऐसे पथराव हुवे है 
घाव के भीतर घाव हुवे हैं 

हर आहट  पहले जैसी है 
चीख में बस बदलाव हुवे हैं 

महंगाई के महासमर में 
सबके ऊँचे भाव हुवे हैं 

बेपरवाह भाई से भाई 
रिश्ते सर्द अलाव हुवे हैं 

समय की गुथ्थी सुलझाने में 
और अधिक उलझाव हुवे हैं 

मिल जुल कर बोलें -बतियाएँ 

असमय प्रेम - डॉ. मुकेश पाण्डेय

उसके प्यार ने जीना
जीना सिखाया है 
टहनी पर एक पत्ती  फूटती है 
धरती को तोड़कर 
बीज द्वीपत्र होता है   
जड़ें पुरे पेड़ को ख़ुराक देती है 
फूल जब खिलते हैं 
तो जड़ें कुछ मांगती नहीं 
फल के पकने पर डालियाँ 
सहज  विनत होती हैं 
मैंने कई बार
Dr.Mukesh Pandey
अपने प्यार को पानी पर लिखा 
उसे जलाकृतियों में बेचैन पाया है 
लहरों से उद्वेलित जल 
तटों की ओर  जाता है
हर जन्म के बाद 
नया क्षितिज खुला पाया 
धरती ने मुझे हर बार 
सहने को कहा है 
तप्त ज्वालाओं के बीच 
हिम किरीट की रक्षा 
कैसे करूँ 

इस बारिश में - मुकेश पाण्डेय

           {१ }
पेड़ अपने लाखों लाख
पत्तों पर
लिखते रहे आपका नाम
नन्हीं-नन्हीं बूँदों  से
इस बारिश में

   {२}
अभी अभी
ठहरी बारिश में
एक गौरैया आई
उसने हल्के से
पेड़ के पत्ते की
बस नोंक को चूमा
पत्ते पर टिकी
कुछ बूंदे झरीं
और सारा पेड़
सिहर गया 

अनुभूति -डॉ. मुकेश पाण्डेय

कितनी ही बार
जिंदगी अपनी प्राकृतिक
रफ़्तार से धीमी हो
जाती है
कितनी ही बार
दिल हंस देता है
तब बेदना में अश्क़
बह  निकलते है


यादें -डॉ. मुकेश पाण्डेय

डरता हूँ यादों को छूने से
कभी-कभी हाथ जल जाया करते हैं 
वर्फ़ से परन्तु फ़िर भी छू लिया करता हूँ 
यादों को 


मेरी पुकार.......... आप तक - डॉ. मुकेश पाण्डेय

रात अब भी डराती  है
नींद अब भी उड़
 जाती है
कदम अब भी लड़खड़ाते हैं 
हाथ आगे बढ़ता है
ख़ाली वापस आ जाता है
हिम्मत नहीं होती
आपको पुकारने की
दिल अब भी उदास हो जाता है
व्यर्थ ही कल्पनायें बनता है
व्यर्थ ही ख़ुद  को आईने में देखता हूँ
अश्कों की क़तार लग जाती है
परन्तु हिम्मत नहीं होती
आपको पुकारने की
क्या आप मेरी
पुकार सुन पायेंगी
सुन,क्या लौट आएँगी ?
यक़ीन तो नहीं पर
कुछ है आपमें
जो आज भी आपकी राह तकता हूँ
देर रात तक जागा  करता हूँ
परन्तु हिम्मत नहीं होती
आपको पुकारने की


















न जाने अपनी हो सोचो का कोई खाका है - डॉ. मुकेश पाण्डेय

न जाने अपनी हो सोचो का कोई खाका है 
वो एक शख़्स  जो हर वक़्त दिल में रहता है 

मैं किस ख़्याल की ख़ुश्बू के दायरे में हूँ 
ये कौन है जो मेरे आस पास बिखरा है 

नशे में जब मैं ग़मो को भुला के घर लौटूँ 
तो फिर कहीं  बड़ी मुश्क़िल  से दिन निकलता है 

बचा-बचा के वो रखता है कांच जैसा बदन 
मैं उसको छुप के भी देखूं तो टूट जाता है 

इक उसके जाने से ख़ाली-सा हो गया हूँ मैं 
मेरा वुज़ूद मेरी रूह को तरसता है 

तेरी जुदाई की  आती है याद रह-रह कर 
सफ़र  में जब भी कोई रास्ता बदलता है 

कहीं मज़ाल कि मैं उसको एक नज़र देखूँ 
कि उसके चेहरे पर सौ आईनों का पहरा है 

बस एक शौक़ -ए -तमन्ना-ए दीद है वर्ना 
नफ़स-नफ़स  शबे-हिज़्राँ को कौन गिनता है 

ख़ुदा  करे कि कभी अपनी आँख से देखूँ 
कि  आहे-तमन्ना का रंग कैसा है 

यहाँ था वो तो मुझे उसका ध्यान ही कब था 
चला गया है तो घर भी उजाड़ लगता है 

दुआएं हमने भी माँगी थी मुकेश" रो-रो कर 
उजड़ गया है गुलिस्ताँ तो अब्र बरसा है 

























 

बहार भेजी है उस शख़्स ने ख़तो की तरह - डॉ. मुकेश पाण्डेय

बहार भेजी है उस शख़्स  ने ख़तो की तरह 
कि लफ्ज़ -लफ्ज़ है शिगुफ़्ता -सा गुलों की तरह 

फ़लक ने खाक़  में मुझको दबा दिया भी तो क्या 
तहे-ज़मी भी हूँ अश्जार की जड़ों की तरह 

रुलाने वाले का दामन न मिल सके जब तक 
रुका हुआ हूँ मैं पलकों पे आंसुओं की तरह 

मुझे समेट  कर कोई गले का हार करे 
बिखर गया हूँ ज़मीं पर मैं मोतियों की तरह 

मुझे बुझाना हवाओं के बस की बात नहीं 
कि जल रहा हूँ मैं बिजली में कुमकुमों की तरह 

न जाने पेड़ में किस का बदन है पोशीदा 
कि टहनियाँ भी निकलती है बाजुओं की तरह 

हमारी गोद  में मुकेश" वो रुके कैसे
कि जिस्म उसका फिसलता है रेशमो की तरह  


रात मत बुनो !- डॉ. मुकेश पाण्डेय

सुनो
रात मत बुनो !

भीड़ की बात मत सुनो
जब अपनी राह  चुनो
स्वयं को सुनो !

घर अथवा घाट नहीं
मरने को खाट नहीं
सड़क को चुनो !

इस दुनिया के अंदर
अँधियारा डगर डगर
रुई सा धुनों !

बनवासी लौटे घर
जगमग हो अवध नगर
स्वप्न ये बुनो !

घर घर हो दीप पर्व
खंडित हो तम का गर्व
ज्योति मन्त्र बुनो !

रात मत बुनो ....


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