शनिवार, 29 अगस्त 2015

बरसे नयना हियरा तरसे परदेस बसे बलमा जबसे -डॉ.मुकेश पाण्डेय

बरसे नयना हियरा तरसे परदेस बसे बलमा जबसे 
केकरा से कहीं वेदना दिल के का हाल भईल बाटे तबसे 

ना कटे तन्हा लम्हा एको पल हर पल उनके हम याद करीं 
छछने छतिया रतिया बिन सजन मन समझे ना का करीं ना करीं 
छनके चूड़ी कंगना खनके सरके चुनरी सिर के सर से 


तन आग लागल लालसा जागल मनसा के पुरइतन अइतन  ऊ 
नाग नागिन अस ये अभागिन से सेजिया पर संघे लपिटइतन ऊ 
करत बतिया झुमका नथिया मोर हार उतरतन ऊ गर से 

क्लेश बड़ी मुकेश पिया ना जिया के हाल ऊ भुझेलन 
रानी के छोड़ी जवानी के सवत नोकरी पर जुझेलन 
राह ताकेनी दिन काटेनी हम रोजीना जइसे तइसे  

विधाता !भाग लिखल कवना कलम से - डॉ.मुकेश पाण्डेय

दुःख ना ओराता ,कहलो ना जाता 
विपत्त दिहल जनम से 
विधाता !भाग लिखल कवना कलम से 

माई के ना देखनी मिलल पापा के ना प्यार हो 
ख़ुशी  रहे दूर ग़म मिलल उपहार हो 
जब दुःख भुलाई हम, हँसे के चाहीं हम 
हंसीं देके छीन लेल  छन  से 
विधाता !भाग लिखल कवना कलम से 


क़िस्मत में फूल हमरा काहे ना खिलेला 
हमके रोवाके भगवान के का मिलेला ?
ढहे सब कल्पना - शीशा नियन सपना 
टूट के बिखर जाला झन  से 
विधाता !भाग लिखल कवना कलम से 





छुवल चाहीं त निकल जालु हाथ से - डॉ.मुकेश पाण्डेय

अपना दांते से ओढ़नी दबाके 
अंखिया मारेलू ओढ़नी चबाके 
रोजो सपना में आवतारु रात से 
छुवल चाहीं त निकल जालु हाथ से 


सुतलो में मन हमार रहेला उड़ान में 
लागे हमरा संघे उड़तारु आसमान में 
पागल भईल बानी पहिला मुलाक़ात से 
छुवल चाहीं त निकल जालु हाथ से 


छछनेला जिया बड़ा हमके सतावेलु 
ढील चाहीं तबो बाहीं में ना आवेलु 
भूख दिल के मिटे ना खाली बात से 
छुवल चाहीं त निकल जालु हाथ से 



पाण्डेय मुकेश से तू भागेलु लजाके 
खिड़की के फँफरा से झाँकेलु लुकाके 
इहे आदत तहार बाटे शुरुआत से 
छुवल चाहीं त निकल जालु हाथ से 

कर्मो का फल तो बन्दे तुझे भोगना पड़ेगा - डॉ.मुकेश पाण्डेय

कर्मो का फल तो बन्दे तुझे भोगना पड़ेगा।
लेकिन यह साईं शक्ति कुछ दर्द कम करेगी,
कुछ अपने सर पे लेगी, कुछ तेरे सर रहेगा॥

आया है तू जहाँ से, जायेगा तू वहीँ पर,
पूछेगा आसमां जब तुने क्या किया ज़मी पर।
तू अभी से सोच रखियो, उसे क्या जवाब देगा॥

औरो को क्या दिया है, औरो से क्या लिया है,
शिकवो के साथ तुने कभी शुक्र भी किया है।
जिस दिन हिसाब होगा, उस वक्त क्या करेगा॥

तन की सजावटो में जो मन को भूल बैठा,
समझो के अपने साईं भगवन को भूल बैठा।
तेरा यह हाल है तो, इसी हाल में रहेगा॥

आज की बातें रखें कल पर चलें - डॉ.मुकेश पाण्डेय

आज की बातें रखें कल पर चलें 
रात गहरी हो चली है घर चलें 

जिस जगह लूटा गया था कल हमें 
आज फिर उस मोड़ से होकर चलें 

घर की दीवारों से क्या निस्बत हमें 
बंद कमरो से जरा बाहर चलें 

रोज़ की फ़िक्रें मसाइल रोज़ के 
अब ये ख़्वाहिश हो चली है मर चलें 

ऐसी गुलपोशी से क्या हासिल मुकेश "
बज़्म में  जिस के  लिए खंज़र चले 

वो पुकारने से ना आएगा उसे क्या करूँगा पुकार के - डॉ.मुकेश पाण्डेय

वो पुकारने से ना आएगा उसे क्या करूँगा पुकार के
मेरी ज़िंदगी से निकल गया कोई अपना वक़्त गुज़ार के

मुझे  घर से लेके चला था वो ,उसे हमसफ़र की तलाश थी
कहीं मुझसे दूर निकल गया मुझे रास्ते में उतार के

मेरे ग़म की बात ना पूछिये की फ़िज़ूल भी है तवील भी
मुझे ज़िंदगी में ख़ुशी मिली कभी जीत के कभी हार के

नहीं तुमपे इसका असर कोई मुझे आज भी मलाल है
जो खिज़ा में तुमने बदल दिए वहीं चार दिन थे बहार के

जो करीब मुझको बुला सके जिसे मैं नज़र में सजा सकूँ
कोई ऐसा फूल मिला नहीं मुझे रस्ते में बहार के





























हरदी छुटल नाहीं -[भोजपुरी पूर्वी गीत ]डॉ.मुकेश पाण्डेय

पड़े रोज सर्दी कइलन गवना बेदर्दी 
हरदी छुटल नाहीं 
जईब का कसे लगल ये सईयां वर्दी 
हरदी छुटल नाहीं 

हमरा सुरतिया के सोना झरी जइहें 
केतनो कमईब मन बड़ा पछितइहें 
गोरे -गोरे गलवा पर पड़ जइहें ज़र्दी 
हरदी छुटल नाहीं 
जईब का कसे लगल ये सईयां वर्दी 
हरदी छुटल नाहीं 


नाहीं जननी सजना सिपाही बाड़े रेल में 
कबो मालगाड़ी पर चलेले कबो मेल  में
छुट्टी तू बढ़ाल नाहीं चली गुंडागर्दी 
हरदी छुटल नाहीं 
जईब का कसे लगल ये सईयां वर्दी 
हरदी छुटल नाहीं 


हमरी जिनिगिया के तू ही संघाती 
मुकेश"पर छोड़ल सईयां जवनिया के थाती 
हम नाही जननी बाड़ एतना बेदर्दी 
हरदी छुटल नाहीं 
जईब का कसे लगल ये सईयां वर्दी 
हरदी छुटल नाहीं 









हमरा लहंगा से जवानी लीकेज होता जी - डॉ.मुकेश पाण्डेय

जोर मारता जवानी दरद तेज़ होता जी 
हमरा लहंगा से जवानी लीकेज होता जी 

खेले के मन करे हउ  वाला खेलS 
जवानी के पोखरा में आके सईयां हेलS 
कवनो सुई आ दवाई नाहीं सेट होता जी 
हमरा लहंगा से जवानी लीकेज होता जी 


सखिया सहेलियाँ सब बन गईली माई 
हमरा हे दुधवा में जोरन कब डलाई 
रउरे कारण ई हमरो करेज रोता जी 
हमरा लहंगा से जवानी लीकेज होता जी 

कि टीकोढ़वा भईल राजा बड़े-बड़े -डॉ.मुकेश पाण्डेय

गवना कराव दिन धरवाव 
एही लगन के भीतरे 
कि टीकोढ़वा भईल राजा बड़े-बड़े 

कब तकले छोड़ब     नईहरवा में अइसे 
करे जवनिया जुलुम बचाईं राजा कईसे 
याद बड़ी आवे -सपना सतावे 
जब सुतीं त तहरे 
कि टीकोढ़वा भईल राजा बड़े-बड़े 


गली में घुमिले त  बोलेला लोग बोली 
बुढ़वो     जवान    निरेखेला     चोली 
सब बात सुन के -मने मन गुन के 
हम सहिले भीतरे 
कि टीकोढ़वा भईल राजा बड़े-बड़े