दुःख ना ओराता ,कहलो ना जाता
विपत्त दिहल जनम से
विधाता !भाग लिखल कवना कलम से
माई के ना देखनी मिलल पापा के ना प्यार हो
ख़ुशी रहे दूर ग़म मिलल उपहार हो
जब दुःख भुलाई हम, हँसे के चाहीं हम
हंसीं देके छीन लेल छन से
विधाता !भाग लिखल कवना कलम से
क़िस्मत में फूल हमरा काहे ना खिलेला
हमके रोवाके भगवान के का मिलेला ?
ढहे सब कल्पना - शीशा नियन सपना
टूट के बिखर जाला झन से
विधाता !भाग लिखल कवना कलम से
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें