गुरुवार, 3 सितंबर 2015

रात हो गईला पर - डॉ. मुकेश पाण्डेय

रात हो गईला पर 
एह  लोग के देह में फुलाला हरसिंगार 
जवन  सवेरे 
एगो उदास सफ़ेद चादर में तब्दील हो जाला 

एह लोग के तहख़ाना में 
पनाह लेला 
ओ कुलीन औरत के स्वप्न-पुरुष 
जेकर बद -दुआ के 
अपना रक्त से ई  लोग पोसेला 

ये लोग के कमर आ जांघ में 
कबो दरद ना होला 
आ कान्हा निढ़ाल ना होला कबो थकान से 
एह लोग के स्तन पर 
दांत आ नोह के निशान 
कबो ना पावल जाला 

पढ़ल लिखल होखे के कवनो भी 
सबूत दिहला बिना 
ई  अपना विज्ञान के 
कला में बदल देवेला 

ई   आज भी 
दस बीस रूपया में 
बाज़ार कके  लवट आवेला लोग 

भगवान जाने 
एह लोग के चाचा ,दादी आ दीदी के 
दोकान कहाँ लागेला 

अपना जनम के स्मृति के 
ई लोग कर देला तर्पण 
आ मृत्यु के बारे में 
एह से ना सोचेला लो 
कि हर चीज़ सोचला से ना होला 

प्रेम मृत्यु ह 
एह बदनाम अवरतन   ख़ातिर 
















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