जवन चाहतारे तेहूँ कर जो रे
ना त डूबी धँसी कहीं मर जो रे
रुपिया पईसा मँगबे भउजी केहु दे दी पईंचा
कवन गुजरी दिही रे भतार तोहके पईंचा
ई कवन लुफत सिखले रे सतभतरी
छुईयो के लाज ना हाया बाटे कवनो गतरी
कुल के इज़्ज़त बुझतारे गजरा मुरई ढईंचा
कहले त कहले दोसरा से जनि कहिहे
ना त लात मुक्का दोसरा से तेहीं सहीहे
खईहे ते मुअड़ी के मार हईंचा -हईंचा
एही ख़ातिर भेजले भतार का तें बहरा
तोहपे 'पाण्डेय मुकेश 'से लगवाईब पहरा
उहे तोर हरिहर रखिहें बाग़ आ बगइचा
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