गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

बच के चल बाछी ख़राब बा ज़माना - डॉ मुकेश पाण्डेय

एक्सन में चलतारु गावतारु गाना 
बच के चल बाछी ख़राब बा ज़माना 

सोलह के उमर बा ई चढ़ल जवानी
सटी जब देहिया हो जइबू पानी पानी 
होश हो जाई  ख़राब लूटी जब खज़ाना 

चलेलु  सड़क पर ओढ़नी  हटाके 
जेने  तेने  घुस जालू  गोरी धकियाके 
तोहरा नथुनी के यु पी बिहार बा दीवाना 

ताकेलु जेने  ओने लोग भहराला 
रूप में बा जादू हमरा अईसन बुझाला 
दिल में बसाल हमके कर ना बहाना 


बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है- डॉ मुकेश पाण्डेय


तुम अगर नहीं आई गीत गा न पाऊँगा

साँस साथ छोडेगी, सुर सजा न पाऊँगा
तान भावना की है शब्द-शब्द दर्पण है
बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है



तुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी है
तीर पार कान्हा से दूर राधिका-सी है
रात की उदासी को याद संग खेला है 
कुछ गलत ना कर बैठें मन बहुत अकेला है
औषधि चली आओ चोट का निमंत्रण है
बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है



तुम अलग हुई मुझसे साँस की ख़ताओं से
भूख की दलीलों से वक्त की सज़ाओं से
दूरियों को मालूम है दर्द कैसे सहना है
आँख लाख चाहे पर होंठ से न कहना है
कंचना कसौटी को खोट का निमंत्रण है
बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है