गुरुवार, 24 सितंबर 2015

शीश उतारी जो हाथ धरे - डॉ .मुकेश पाण्डेय द्वारा रचित हिंदी महाकाव्य

भक्ति करना राम की,    नहीं कायर का काम 
शीश उतारी जो हाथ धरे ,वहीँ ले हरि का नाम 

[1] चलते हैं लाखों लोग यहाँ पर ,कुछ ही मंज़िल पाते हैं
      इसलिए नहीं की राह कठिन इसलिए की रुक-रुक जाते हैं 
    मृत्यु से मत होना ग़ाफ़िल ,ज़िन्दगी इलहाम 

[२]  ज्ञानी से संगत कर लेना ,कुछ दूर तुम्हें ले जाएगा 
      कुछ दूर शास्त्र ले जाएंगे ,कुछ दूर गुरु पहुंचाएगा 
     आगे पथ अनजाना होगा ,मत करना विश्राम 

[३]  अपने जीवन की फ़िक्र करो ,परहित का तब ही ज़िक्र करो 
       ख़ुद गया नहीं जो मधुशाला ,भर पायेगा किसका प्याला 
     हो हृदय प्रेम से शून्य अगर ,तो मत करना प्रणाम 

[४] बहुजन हिताय बहुजन सुखाय माना यह मन्त्र क़ीमती है 
     स्वांत सुखाय जो जी न सका ,ज़िन्दगी न उसपर रीझती है 
   पहले ख़ुद ग़ज़ल बन जा ,फिर दे अपना तान 
क्रमशः......................................... 


        

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