रविवार, 27 सितंबर 2015

तुमको चाहा कितना -कितना मैंने अपनी चाह में - डॉ मुकेश पाण्डेय

तुमको चाहा कितना -कितना मैंने अपनी चाह में 
सुरुजमुखी खेत में झूमे ,फसलें खड़ी गवाह में 

रुकता नहीं प्यार ,प्यार यह , नदी , झील-पर्वत सा 
मीठा-मीठा लगे रात-दिन ,शहद घुले शर्बत सा 
लाज का गहना पहने तेरी ,आँखे बसी निग़ाह में 


इन हाथों से रची रोटियाँ ,प्यारी पकवानो सी 
लहू उगाती क्षण-क्षण मुझमें ममता वरदानों सी 
धुप हवा पानी इस घर में घूमें भली सलाह में 


अबके काट रहा जब मैं ख़ुद अपने हाथों फ़सलें 
परस तुम्हारे हाथों का भी कहता मिलकर हँसले 
पीला फूल कनेर इक ,खिलता है दिन माह में 

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