रविवार, 27 सितंबर 2015

जब देहियां गरमाला - डॉ मुकेश पाण्डेय

जब देहियां गरमाला बिछाके बोरा सुतावे  भुईयां रे 
पटे पलट के डॉक्टर बलमुआ घोंप देला सुईया रे 

जबसे गवनवा गईनी हम ,आफत हजार पवनी हम 
केतना बताईं देहिया पर केतना आख़िर सहनी हम 
जब जिउवा घबराला उठाके गोदी ले जाला गुइयाँ रे 

मनवा मोर करे नाहीं नहिरा छोड़ के ससुरा जाईं 
कईसे आपन दुखवा ई ,अपना बलम के समझाईं 
किल्ली लगाके दियवा बुताके पटे करे पेटकुईंया रे 

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