सोमवार, 27 जून 2016

अइसनो जे नईखे -भोजपुरी कविता [डॉ मुकेश पाण्डेय ]

ऊ रात जवन हमरा पर भारी बा 
ओहि रात के  ई तइयारी बा 
दम साध के हम बईठल बानी 
दम साध के ही बईठल बानी 

अबहीं कुछऊ होते-होते 
एह वक़्त के मतलब बो दिही 
ई ज़ोर -ज़बर के हर क़िस्सा 
इक रोज़ त मानी खो दिही 
एक दिन बदल जाई ई दुनिया 
हमरा जियते -जी सब होई 
हमरा अखियन के आस-पास 
अइसनो जे नईखे की कवनो 
रफ़्तार अलग होई कतहुँ 
जब दौर बदल जाला कतहुँ 
चुटकी एक साथ बजावे से 
अइसनो जे नईखे चुपे -चोरी 
हम बुद्ध कहीं हो जाईब हो 
अइसनो जे नईखे कि 
सन्नाटा 
कुछ आउर नाही गहराई हो 
अइसनो जे नईखे बिन बोले 
अल्फाज़ कहीं ख़ुश्बू दिही 
अइसनो त नईखे चरे वाला 
कुछ बीज कहीं पर बो दिही 
एक चीज़ प ज़ोर लगईला से 
ई सब ढांचा हिल जाई 
तनी अउर कुरेद धरती के 














कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें