रविवार, 30 अगस्त 2015

क्या पता है तुझको कब ज़िंदगी की शाम ढल जाए - डॉ.मुकेश पाण्डेय

क्या पता है तुझको कब ज़िंदगी की शाम ढल जाए 
कर भलाई ऐसी जिससे ज़िंदगी सम्हल जाए 

ईंटो के पहाड़ तेरे यहीं पे छूट जायेंगे 
मीट्टी के बदन ये तेरे पल में टूट जायेंगे 
हृदय के हिमालय से गंगा निकल आए 

ज़िंदगी की आस दुनिया का संवर जाना है 
मौत इंसान के सपनो का बिखर जाना है 
मेरी कोशिश है यहीं सूरत ये बदल जाए 

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