रविवार, 30 अगस्त 2015

तुम्हें मन की बातें बताने का मन है - डॉ.मुकेश पाण्डेय

तुम्हें मन की बातें बताने का मन है 
अकेले में सुनने सुनाने का मन है 

तेरे साथ हँसने हँसाने का मन है 
तुम्हें छेड़ने का सताने का मन है 

तू आ मेरे होठों पर मुस्कान बन कर 
तुम्हें प्यार से गुनगुनाने का मन है 

समंदर को तैर आया हूँ लेकिन 
तेरी आँख में डूब जाने का मन है 

मेरी इन दिनों है मेरे दिल से अनबन 
तुम्हें साथ लेकर मानाने का मन है 

तेरी याद को अपने दिल में बसाकर 
हरेक याद को भूल जाने का मन है 

ज़माने ने दी है बहुत चोट लेकिन 
किसी फूल से चोट खाने का मन है 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें