शनिवार, 12 सितंबर 2015

हमरा जिए के बढ़िया जोगाड़ हो गईल - डॉ. मुकेश पाण्डेय

मुक्तक : एनियो जवानी बा ओनियो जवानी 
              भला कईसे दुनो मिले बिना मानी 
             इहे बात हमरो पर लागू भईल 
             आ अइसने बनल कुछ हमरो कहानी 

जेकरा घर में किराया पर रहत रहीं 
ओ घर वाली गुजरिया से प्यार हो गईल 
दिल के बात दिल से कहाये लागल 
हमरा जिए के बढ़िया जोगाड़ हो गईल 

ओहिजा लिहनी कोठरिया हम ओकरे बदे 
एक बेर देख लिहीं त किराया सधे 
पहिले अँखियन से अँखियन में बतिया भईल 
फिर धीरे धीरे उ हमार हो गईल 

हम नीचे रहीं उ त ऊपर रहे 
ओने गंगा बहे एने जमुना बहे 
 एक दिन दुनो नदियाँ के संगम भईल 
फिर त जिनगी हमार गुलज़ार हो गईल 

प्यार के गंध पुरुआ के साथे बहल 
ओकरा माई आ बाबू के पाता चलल 
पहिले परिवार ओकर कईलस बवाल 
पाछे अपने से उ त इयार हो गईल 

लागे हमरा त सरग भेंटा गईल बा 
कवनो सिकिया शरीरिया मोटा गईल बा 
रहे कुछुवो बनावत चिखावत रहे 
प्यार में ई बेसुर लयदार हो गईल 










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