शनिवार, 12 सितंबर 2015

तू चल अभी - - डॉ. मुकेश पाण्डेय


तू चल अभी...

तू चल,
कि तेरी हथेलियों को बहुत से,
पत्थर निचोड़ने है ।

तू चल अभी,
कि तेरी बेबसी को बहुत से,
कानून तोड़ने है ।

सहेगी तू,
अत्याचार कब तक,
करेगी यु ही,
विचार कब तक,
कटेंगे तेरे,
पंख यु ही कब तक,
टूटेंगे सपनो के,
शंख  कब तक,
ठगेगा तुझे,
समाज कब तक,
लुटेगी तेरी,
लाज कब तक,

जो भय है,
उसको तू क्रोध कर दे,
विवशता का अब,
विरोध कर दे,
मिलेगा किस तरह,
न्याय तुझको,
ये ढूंढ़ना है,
उपाय तुझको,

कठोर अग्नि-परीक्षा,
कब तक चलेगी,
तू एक,
चिता की तरह,
बता कब तक जलेगी ?
तू धूल को अब,
गुलाल कर दे,
समय के सूरज को,
लाल कर दे,

जो ज्योत  मन में,
दबी-दबी है,
उसे  जला कर,
मसाल कर दे,
जो तेरे,
अस्तित्व को नकारे,
वो पुस्तकें ,
आज फाड़ दे तू,
जिसे उखाड़े,
न कोई आंधी,
शिखर पर वो सूल,
गाड़ दे तू,

तू चल ,
कि तेरी हथेलियों को बहुत से,
पत्थर निचोड़ने है ।

तू चल अभी,
तेरी बेबसी को बहुत से,
कानून तोड़ने है ।

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