मंगलवार, 18 अगस्त 2015

अब बुझ जईब सेजे प सईयां, गर के हाला ले अईल ना{लोकगीत } - डॉ. मुकेश पाण्डेय

जब- जब गईल विदेश बलमुअा मंगनी बाला ले अईल ना 
अब बुझ जईब सेजे प सईयां, गर के हाला ले अईल ना 

एक बेरी गईल त हांफ़त अईल, सबुर क के महटिआ गईनी 
भोली सुरतिया प सारा गिला गम, शिक़वा शिक़ायत भुला गईनी 
तबकी गईल त कुछ ना ले अईल ,रुसनी पिया मना लिहल 
मानी ना  मन अब पटी  ना एक क्षन,  छछने जीव छछना दिहल 
जाड़ा के बेरिया सिउटर ना मफलर, साला दोसाला ले अईल ना 
अब बुझ जईब सेजे प सईयां, गर के हाला ले अईल ना 


अईब पलंग पर मन में उमंग भरी, मुँहवा फेरबी पलट जाईब 
लहि ना लव छव छुवे ना देब देंह ,पलंग के पाटी तर सट जाइब 
चाहे लुभइब रीझईब मनइब, पट गोड़तारी ओरि हट जाईब 
ढेर कुरुरईब त  ढेर पछितईब, ननद के खाटी पर उलट जाइब 
छूछी ना पायल ना झुमका ना कँगना, मोती के माला ले अईल ना 
अब बुझ जईब सेजे प सईयां, गर के हाला ले अईल ना 

गईल बंगाल माँगटीका मंगलसुत, छाड़ा कमरबंद ना आईल 
सोना के चैन टप बॉम्बे के मेकअप, साबुन सुगंध गंध ना आईल 
आगरा के जूती बनारस के कुर्ती, गोटा जड़ल साड़ी भूली गईल 
बॉम्बे से लहंगा चोली ना महंगा, झोरी धरवल त भूली गईल 
छूछे बा ओठ गाल, पाके ना बढ़े, तेल केश काला ले अईल ना 
अब बुझ जईब सेजे प सईयां, गर के हाला ले अईल ना 




















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