शनिवार, 29 अगस्त 2015

वो पुकारने से ना आएगा उसे क्या करूँगा पुकार के - डॉ.मुकेश पाण्डेय

वो पुकारने से ना आएगा उसे क्या करूँगा पुकार के
मेरी ज़िंदगी से निकल गया कोई अपना वक़्त गुज़ार के

मुझे  घर से लेके चला था वो ,उसे हमसफ़र की तलाश थी
कहीं मुझसे दूर निकल गया मुझे रास्ते में उतार के

मेरे ग़म की बात ना पूछिये की फ़िज़ूल भी है तवील भी
मुझे ज़िंदगी में ख़ुशी मिली कभी जीत के कभी हार के

नहीं तुमपे इसका असर कोई मुझे आज भी मलाल है
जो खिज़ा में तुमने बदल दिए वहीं चार दिन थे बहार के

जो करीब मुझको बुला सके जिसे मैं नज़र में सजा सकूँ
कोई ऐसा फूल मिला नहीं मुझे रस्ते में बहार के





























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