अपना दांते से ओढ़नी दबाके
अंखिया मारेलू ओढ़नी चबाके
रोजो सपना में आवतारु रात से
छुवल चाहीं त निकल जालु हाथ से
सुतलो में मन हमार रहेला उड़ान में
लागे हमरा संघे उड़तारु आसमान में
पागल भईल बानी पहिला मुलाक़ात से
छुवल चाहीं त निकल जालु हाथ से
छछनेला जिया बड़ा हमके सतावेलु
ढील चाहीं तबो बाहीं में ना आवेलु
भूख दिल के मिटे ना खाली बात से
छुवल चाहीं त निकल जालु हाथ से
पाण्डेय मुकेश से तू भागेलु लजाके
खिड़की के फँफरा से झाँकेलु लुकाके
इहे आदत तहार बाटे शुरुआत से
छुवल चाहीं त निकल जालु हाथ से
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