शनिवार, 29 अगस्त 2015

आज की बातें रखें कल पर चलें - डॉ.मुकेश पाण्डेय

आज की बातें रखें कल पर चलें 
रात गहरी हो चली है घर चलें 

जिस जगह लूटा गया था कल हमें 
आज फिर उस मोड़ से होकर चलें 

घर की दीवारों से क्या निस्बत हमें 
बंद कमरो से जरा बाहर चलें 

रोज़ की फ़िक्रें मसाइल रोज़ के 
अब ये ख़्वाहिश हो चली है मर चलें 

ऐसी गुलपोशी से क्या हासिल मुकेश "
बज़्म में  जिस के  लिए खंज़र चले 

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