देखते -देखते शाम
मेरे कमरे में
जंगले से
कुछ मोर पंख
रख कर चली गयी
मैं धीरे-धीरे उठी और
बिना बताये अपनी कॉपी में
छुपा लिया
सुबह-सुबह
बाग़ में गयी
तो तितली ने
ताना मारा
चलो
मुझसे बनती हो
जाकर ज़रा शीशे में
अपना चेहरा तो देखो
तुम्हारी आँखों के जो
लाल धागे हैं
तुमसे कहीं आगे हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें