मंगलवार, 25 अगस्त 2015

एक बेर पाछे घूम के -डॉ मुकेश पाण्डेय

कुछ देर पहिले 
तू जवना मोड़ से गईल ह 
उ मोड़ अबहीं ले 
एगो शालीन उत्तेजना से 
थरथराता 
स्पंदित होता 
विस्मय से 
कि तू जाईयो सकेल का ?
जाहीं के बा त जा 
लेकिन वोह लेखा से मत जा 
जवना लेखा 
जाला चानी पर के  बार 
ओह लेखा से भी ना 
जवना लेखा 
माई बाप के बिलखत छोड़ 
परदेस में बस जातारें बेटा 
जइसे चल जाला सपना 
नींद से बाहर 
जे लेखा 
चल जाता लईकन के खेलवना 
स्कूल के मास्टर रिटायर होके 
अपना अपना घरे 
चल जालें 
बादल 
घुमड़ घुमड़ के आवता 
मगर बिना बरसलें चल जाता 
जा 
लेकिन वापस आवे के
 कवनो पगडण्डी ईयाद रखिह 
जा 
मगर 
ईयाद रखिह कि जाते जाते 
एक बेर पाछे घूम के 
देखल भी बहुत ज़रूरी होला 



















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