देवि अपने वाध्य से परिचय कर दो
काव्य के सुर,राग में मैं बजा पाऊँ
तुम मुझे इस यंत्र के सब गुर बता दो
देवि अपने वाध्य से परिचय कर दो
भाव कैसे जागते हैं
हृदय की अनुगूँज कैसे गीत में निज ढालते हैं
मीड़ क्या वीणा की ,गुरु-मन्त्र इसका तुम सीखा दो
देवि अपने वाध्य से परिचय कर दो
साधना, आराधना की विद्या से -
अवगत नहीं मैं
भाव,भाषा,व्याकरण के शिल्प का
अधिपति नहीं मैं
मैं तुम्हारा बन पुजारी,कौन से नैवेद्य लाऊँ ?
तुम्हीं बतलाओ तुम्हारा अर्घ्य मैं कैसे चढ़ाऊँ ?
स्वयं निज अभ्यर्थना के श्लोक तुम मुझको सुना दो
देवि अपने वाध्य से परिचय कर दो
साधना में सुगति दो तुम,
सुमति दो चिंतन-क्षणों को
मिल सके पहचान मुझको
सम्मिलित हूँ जब गणों में
ग्रहण कर मुझको किसी वरदान का धारक बना दो
गात के ढीले पड़े सब तार मेरे झनझना दो
देवि अपने वाध्य से परिचय कर दो

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