बुधवार, 26 अगस्त 2015

गुज़ारा किस तरह मौसम नज़ारे बोलते हैं - डॉ मुकेश पाण्डेय

गुज़ारा किस तरह मौसम नज़ारे बोलते हैं 
तुम्हारी आँख से टूटे सितारे बोलते हैं 

जिसे तुम छोड़ आये थे कहीं ठंढी रुतों में 
अभी उस राख़ के अंदर शरारे बोलते हैं 

ख़ामोशी से ये किसकी आस ले के जी रहे हो 
समंदर से समंदर के किनारे बोलते हैं 

कभी जब याद कोई आ के दामन थामती है 
किसी की आँख के क़ातिल इशारे बोलते हैं 

मुकेश"जाते कहाँ हो शीशा-ए-दिल अपना लेकर 
वहां पत्थर की भाषा लोग सारे बोलते है 

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