मंगलवार, 1 सितंबर 2015

हमरे सईयां हो क देल जवनिया के खून [भोजपुरी लोकगीत ] डॉ.मुकेश पाण्डेय

घरवा कके फ़ोन चली गईले देहरादून 
हमरे सईयां हो क देल जवनिया के खून 

दिनवा ना चैन रतिया निंदियो ना आवेला 
साँचे कहीं सेजिया पिया काटे मोहे धावेला 
का करब आके जब बीती जाई मई -जून 

तित बोली देवरु के लागे जइसे गोली 
छठ आ दशहरा हमके भावे नाही होली 
भरली जवनिया में लागतते घुन 

दिलवा के दर्द जोग कब ले अंगेजी 
नीच उंच बोली सुन के फाटता करेजी 
जरल हमरा देहियां पर लोगवा छींटे नून 

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