मंगलवार, 1 सितंबर 2015

चलो कि लौट चलें छुट्टियाँ तमाम हुई -डॉ. मुकेश पाण्डेय

दिलो-निग़ाह की सरगर्मियां तमाम हुई 
चलो कि लौट चलें छुट्टियाँ तमाम हुई 

न इन्तिज़ार न अब साअतें विसाल की फ़िक्र 
तमाम वक़्त की पाबंदियाँ तमाम हुई 

कभी वो ख़्वाबों का शाहज़ादा आ ही जायेगा 
इस इन्तिज़ार में शाहज़ादिया तमाम हुई 

किसी ने दर्द की दौलत से मालामाल किया 
सो इक उम्र में महरूमिया तमाम हुई 

पसे-निग़ाह करम देखकर मलाल हुआ 
मगर वो रोज़ की हैरानियाँ तमाम हुई 

मुकेश'लौट के जाना भी कब रहा मुमक़िन 
कि जिनसे आये थे वो कश्तियाँ तमाम हुई 

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