जमाना के चमक दिल के रास नईखे आवत
हमार जिनगी गुज़र गईल एमे शहर बसावत
हालत हमरा दिल के कह हमके के बताई
हम खुद में ही कई रोज से पहुँच नईखीं पावत
दुनिया के तक़लीफ़ के मन बा पिरोई ग़ज़ल में
एकरा अलावा हमरा कवनो काम नईखे आवत
घर के ना अच्छा लागे हमार आवारा-मिज़ाजी
ना जाने कहाँ-कहाँ बिया रात ई घुमावत
आव तू हमरा कोरा में बितावे ख़ातिर रात
ढेर दिन हो गईल बा तोहके सीना से लगावत
दिल तोहसे जुदा हो के भी वीरान ना भईल
तहार याद घर बना के एमे जिनगी बा बितावत
दिन केतना बीत चुकल बा एकर ख़बर भी नईखे
केहु काहे नईखे जा के सुरुज के जगावत
मुकेश पाण्डेय "शायरी में ताज़गी लियाव
कहिया ले घुमब ग़ालिब के दीवान उठावत
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