मंगलवार, 15 सितंबर 2015

पांच मुक्तक - डॉ मुकेश पाण्डेय

कवन मज़ा बा ओह गली में देखे नाहीं पईनी 
हम पहिले त बुझत रहनी स्वर्ग में भी कुछ बा 
दारू में त मजे मज़ा  बा जब भी पियले बानी 
तू कहेल छोड़ द पियल तहरा संघत में कुछ बा 

बेरोज़गारी फईलल बा पढ़लो लिखला के बाद 
कतहुँ केहु में कहाँ बा बात करे के लूर 
कवलेज में त धूम मचल बा 'पास-पास' के 
नोकरी माँगे जा त अफ़सर कहे 'दूर-दूर '

हिन्दू- मुस्लिम में हिन्द के नेव भी बा 
अफ्तार में खजूर बा त सेव भी बा 
'अल्लाह-अल्लाह' मियां लोग कहे बेशक 
लेकिन एगो रंग 'बम-महादेव ' भी बा 

हिन्दू-मुस्लिम दुनो एके 
यानी दुनो हवे एशिआई 
एकदेश एकबोली एकेकिस्मत 
काहे नईख कहत कि ह भाई-भाई 


एको रत्ती ऊ ना करीहें मरव्वत 
ऊ अपना रुख से मुंह नाहीं मोड़िहें 
जमराज कहीं जान बक्सीयो देवे पर 
डागडर साहेब एको आना फ़ीस नाहीं छोड़ीहे 
















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