बुधवार, 26 अगस्त 2015

प्रेम-फूल - डॉ मुकेश पाण्डेय

 फूल समझकर प्रेम को पाला 
पर काँटों की बन गयी माला 
चुभ रहे हैं अंग-अंग में दहक रही दिल दर्द की ज्वाला 


सुरुचि सुवास सरस शुचि सुन्दर 
अगणित गुण  हैं उसके अंदर 
अमृत समझा था मैं जिसको वह तो निकला विष का प्याला 

महामोह         में मरता 'मुकेश"
विरह-व्यथा कलियों का क्लेश 
सुख-पराग समझा था जिसको बना वहीँ दुःख का भाला 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें