बुधवार, 26 अगस्त 2015

चाँद छत पर ऊगल बा पड़ोसी के - डॉ मुकेश पाण्डेय

बात सगरो चलल     मदहोशी के 
चाँद छत पर ऊगल बा पड़ोसी के 
देख के ना-समझ दिल मचल जाता ई 
हुद्बुदी होखे लागे गर्मजोशी के 

मस्ती लउके बनारस सा अंगड़ाई में 
ताज आगरा के झलकेला सुघराई में 
ई त  दवा भईल बा बेहोशी के 
चाँद छत पर ऊगल बा पड़ोसी के 

पागल मन होला पायल के संगीत से 
हार अच्छा लागे अब त हर जीत से 
हम केतना कहीं एह बे-वशी के 
चाँद छत पर ऊगल बा पड़ोसी के 

उनके चेहरा पर जियरा फ़िदा हो गईल 
कुछ समझ नाहीं पवनी ई का हो गईल 
होला हैरान मन सोची-सोची के 
चाँद छत पर ऊगल बा पड़ोसी के 

मीठी बतियन से मोती के झरना बहे 
आशिक़ दिल पे क़सम से क़यामत ढहे 
मुकेश'दिलवा दीवाना बा हंसी के 
चाँद छत पर ऊगल बा पड़ोसी के 












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