गुरुवार, 27 अगस्त 2015

कुछ ऐसे पथराव हुवे है


वाया पाण्डेय पुर चौराहा

डॉ.मुकेश पाण्डेय

घाव के भीतर घाव हुवे हैं

  Wednesday August 26, 2015  

Silver: 665


 
 
0
कुछ ऐसे पथराव हुवे है 
घाव के भीतर घाव हुवे हैं 

हर आहट  पहले जैसी है 
चीख में बस बदलाव हुवे हैं 

महंगाई के महासमर में 
सबके ऊँचे भाव हुवे हैं 

बेपरवाह भाई से भाई 
रिश्ते सर्द अलाव हुवे हैं 

समय की गुथ्थी सुलझाने में 
और अधिक उलझाव हुवे हैं 

मिल जुल कर बोलें -बतियाएँ 
दिल पर बहुत दबाव हुवे हैं

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें