गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आज बाल दिवस हैं - डॉ मुकेश पाण्डेय

आज बाल दिवस है 
खुश होने का दिन 
उत्सव का 

एक आयोजन का 
देश में विदेश में 
यहाँ भी वहां भी 
मैं भी खुश हूँ 

मुझे कुछ  लिखने को मिलेगा 
नेता भी खुश हैं 
उन्हें कुछ बोलने को मिलेगा 
और खुश हैं वो बाल  मज़दूर  भी
उन्हें 'बाल  दिवस' के पोस्टर चिपकाने 
का काम मिलेगा 
शायद उन्हें यही पता है इन दो शब्दों का 
कि -इस दिन उनके घर चूल्हा ज़रूर जलेगा 
ख़ाली नहीं बैठना होगा 

अचानक मेरे बराबर से गुजर जाती है 
सायं से कई गाड़ियाँ 
उस जगह जहाँ भाषण होना है 
जिस जगह नेताओं को मगमच्छी आंसू रोना है 
और बाल दिवस की मूल परिभाषा को 
झूठे वादों में खोना है 
मैं भी लगभग भागता हूँ उस तरफ 
जहाँ नेताजी एक बच्चे को गोद में उठाये हैं 
लेकिन बच्चे की आँखों में असमंजस है 
गोद से उतरने की अकुलाहट ,

उसे शाम को पूरे पैसे नहीं मिलेंगे
 क्योंकि उसने अभी आधे पोस्टर ही चिपकाये हैं 
लेकिन कौन सुने उसकी
कौन है जिससे कहे वो दिल की बात 
नेता जी दिल खोलकर माइक पर चीख रहे हैं 
लोग खुश हो-होकर ताली पिट रहे हैं 
पत्रकार धड़ाधड़ फ़ोटो खिंच रहे हैं 
हर किसी का यही स्वार्थ होगा शायद 
उस बच्चे को 
गरीबी की ,अशिक्षा की 
और जुर्म की सौग़ात 

अचानक उस लड़के के चेहरे पर रौनक़ आती है ,
क्यूंकि उसे आजादी मिल गयी है 
लोगों के अंतर की जो काली रस्सी थी 
उससे मुक्ति मिल गयी  
वो लगभग भागता हुआ सा 
सर पर पोस्टरों के गठ्ठर को रखकर
कुछ हड़बड़ाहट कुछ परेशानी और कुछ सोच में 
उसे तो इन सबको जल्दी से जल्दी चिपकाना है 
नहीं बैठना है थककर 
उस मासूम को गुस्सा आ रहा हैं 
उस भीड़ पर ,उन नेताजी और उस व्यवस्था पर 
इस वजह से नहीं कि वे सब झूठे हैं 
फ़रेबी हैं मक्कार हैं 
बल्कि इस वजह से 
की अगर वे नहीं रोकते उसे तो 
चिपक  जाते अब तक सारे पोस्टर 

इस वक़्त वो केवल 
पोस्टर चिपकाने  में खोया हुआ है 
उसे कुछ नहीं पता 
कुछ लेना देना नहीं इस बात से 
कि सरकार क्या है 
व्यवस्था क्या है 
अनीति क्या है 
और  भ्रष्टाचार क्या है 
उसे उस पैसे से क्या वास्ता 
जो कागजों में उसके नाम लिखा हुआ है 
जब कि हक़ीक़त में 
नेताओं और सरकारी 
कर्मचारियों 
का ही भला हुआ है 
वो तो किसी और ही दुनिया में गुम है 
पुरे पोस्टर चिपकेंगे 
कुछ पैसे मिलेंगे 
कुछ सामान आएगा 
उसमें  होगा 
आटा -दाल -मसाला 
और क्या होगा 
और हाँ किताब भी तो 

लेकिन वो कैसे ?
माँ की दवा 
अवसाद से भरा मन 
हाथों में धीमापन 
आँखों में धुंधलाहट -चमकीला भविष्य 
वो चुपचाप -हाथ रोककर 
खड़ा हो कर 
एक हाथ में चंद बचे पोस्टर 
और एक में बाल्टी में कूंची डाले 
देखता है चारों ओर 

कुछ नहीं है 
अगर है तो वो अकेला 
साथ में ये हवा  धूप 
ये धरती ये आसमाँ 
वो चल देता है ख़ामोशी  से 
सर को झटककर 

अंतिम पोस्टर को स्कूल की दिवार 
के पीछे चिपकाता हुआ 
झाँकता है वो क्लास में 
उस खिड़की से पढ़ाता हुवे मास्टर को 
पढ़ते हुवे बच्चे को 
मूक खड़ा देखता रह जाता है 
और सोचता है 

क्या ये आसमान से उतरे हैं 
नहीं नहीं  हैं तो यही के 
लेकिन पढ़ लिख कर 
आसमान को ज़रूर छुवेंगे 
उसे भी ललक है 
उन काले काले से खूबसूरत 
अक्षरों को पढ़ने की 
बड़ी-बड़ी प्रतियोगिताओं में लड़ने की 
लेकिन वो सब ख्वाब है 
ये सब हक़ीक़त है 
वो सब यहीं देखते रहने को विवश हैं 
खामोश हैं 
वो पागल है 
शायद 
उसे हंसना चाहिए 
जानता  नहीं कि  आज बाल दिवस हैं 

































































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