अब फिर वहीं से शुरू करता हूँ
जहाँ से चीजों की सही शक्ल
ओझल होनी शुरू हो जाती है
अपने ही आस पास बने हुवे जाल में
नज़र डूब जाती है
छोटी बड़ी उलझनों के गुथ्थीदार अंधेरों में
भटकते हुवे
मैंने समझा था
कि दुर्गम पर्वतों से जूझ रहा हूँ
हर बार टकरा कर
कुछ कदम आगे बढ़ता जा रहा हूँ
पर फिर मैंने जाना
कि अँधेरे के पर्वत और बड़े हो कर
मुझसे बहुत आगे निकल गए हैं,
इस शापित व्यवस्था पर
रोम-रोम फ़ैल गए हैं
और मेरे कदम
जहाँ से चले गए थे
वहीँ रह गए हैं
यह विफलता नहीं
वक़्त की गहरी उदासीनता में
अकेला हो जाने का एहसास भारी हैं
उन धड़कनो से मिलकर मजेगा मिटेगा
जहाँ हर मन है कुरुक्षेत्र
युद्ध अभी जारी है
यह सही है
की मेरे शब्द के आकाश में
अब भी अक्सर गरम बिजली कौंध जाती है
हर फरेब की जकड़न को
थोड़ी देर रौशनी में नंगा कर जाती है
मेरे पास सिर्फ शब्द है
जो समय के अस्त्र हैं
इन अस्त्रों की धार बचा चमकदार रखना है
क्यूंकि चारों तरफ आज बड़े चालक शब्द हैं
जो भीतर से जंग लगे हैं
बाहर से चुस्त हैं
उन शब्दों को बेनक़ाब करना है
इनका तेवर तेज तीखा है
भीतर समझौता है ,
सुरक्षित कायरता है
असलियत पर मुखौटा है
ये चतुर शब्द
वक़्त में मुताबिक करते अर्थों की चोरिया
पर ऐसे में कौन रह सकता है आरक्षित
जब आदमी पर गिरती हो चौतरफ़ा बिजलियाँ
लोग कहते हैं
जो तुम नहीं हो
वह होना अब मुश्किल है ,
जो छूट चुकीं राहें उन्हें पाना बहुत मुश्किल है
पर आदमी अपने से ही होता परास्त है
मजबूरियों की बात सिर्फ़ होती बहाना है
दुनिया को धोखा देना है
मन समझाना है
मैं वक़्त के सामने
शब्द-दर्पण के सामने
पूरा अपने ही पास हूँ
यह अकेलापन एक नयी तरह की चुनौती है
जो आदमी को सही नाम देने की
पहचान मुझे देती है
इसलिए अब फिर वहीँ से शुरू करता हूँ
जहाँ से चीजों की सही शक्ल
साफ दिखने लग जाती है
जब अपने से बड़े दुःख की आवाज़
शब्द में उतर जाती है

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें