शनिवार, 22 अगस्त 2015

बिछड़ की फिर तुझे तेरी ख़बर न आये कभी - डॉ. मुकेश पाण्डेय

बिछड़ की फिर तुझे तेरी ख़बर न आये कभी 
मैं इंतज़ार करूँ और सहर न आये कभी 

हजार चाहूँ मगर मैं तुझे भुला न सकूँ 
ख़ुदा  करे की मुझे ये हुनर न आये कभी 

ये सोचता हूँ कि क्यों तेरे रु-ब-रु होकर 
मेरा वुजूद मुझे भी नज़र न आये कभी 

बरहना-सर जहाँ फिरती है आरजू मेरी 
तेरे नसीब में वो दोपहर न आये कभी 

विसाल कुछ भी नहीं मर्गे-आरज़ू के सिवा 
मेरे दुआ में इलाही असर न आये कभी 

किसी ने देखी भी है मंजिलें-जुनूँ अब तक 
जो तुझको ढूंढ़ने निकले वो घर न आये कभी 

जो दोस्त मिला है तुझको ही पूछता है मुकेश "
नज़र में फिर तेरा नक्शा उतर न आये कभी  

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