शनिवार, 22 अगस्त 2015

मेरे गांव में- डॉ. मुकेश पाण्डेय

आज मसीहा नहीं है 
पहुंचे जो मेरे गांव में 
नफरत की आँधी 
उड़ा रही 
स्तम्भों को मेरे गांव में 
रिश्तों का कोई मेल नहीं 
अपना अपनों से कतराता 
देखो मेरे गांव में 
आठ लोग 
चूल्हे चार 
इक बस्ती सरहदें हजार 
मध्य आँगन में 
उठ जाती है 
दीवारें मेरे गांव में 
दादी जब मसले कहती है 
खेतों की फसलें रोती  हैं
डाल कोई ले जाता है 
जड़ को कोई खोदे 
बाग़ बग़ीचे तक रोते  हैं  
बेबस मेरे गांव में।  











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