रविवार, 16 अगस्त 2015

मेरी पुकार.......... आप तक - डॉ. मुकेश पाण्डेय

रात अब भी डराती  है
नींद अब भी उड़
 जाती है
कदम अब भी लड़खड़ाते हैं 
हाथ आगे बढ़ता है
ख़ाली वापस आ जाता है
हिम्मत नहीं होती
आपको पुकारने की
दिल अब भी उदास हो जाता है
व्यर्थ ही कल्पनायें बनता है
व्यर्थ ही ख़ुद  को आईने में देखता हूँ
अश्कों की क़तार लग जाती है
परन्तु हिम्मत नहीं होती
आपको पुकारने की
क्या आप मेरी
पुकार सुन पायेंगी
सुन,क्या लौट आएँगी ?
यक़ीन तो नहीं पर
कुछ है आपमें
जो आज भी आपकी राह तकता हूँ
देर रात तक जागा  करता हूँ
परन्तु हिम्मत नहीं होती
आपको पुकारने की


















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