न जाने अपनी हो सोचो का कोई खाका है
वो एक शख़्स जो हर वक़्त दिल में रहता है
मैं किस ख़्याल की ख़ुश्बू के दायरे में हूँ
ये कौन है जो मेरे आस पास बिखरा है
नशे में जब मैं ग़मो को भुला के घर लौटूँ
तो फिर कहीं बड़ी मुश्क़िल से दिन निकलता है
बचा-बचा के वो रखता है कांच जैसा बदन
मैं उसको छुप के भी देखूं तो टूट जाता है
इक उसके जाने से ख़ाली-सा हो गया हूँ मैं
मेरा वुज़ूद मेरी रूह को तरसता है
तेरी जुदाई की आती है याद रह-रह कर
सफ़र में जब भी कोई रास्ता बदलता है
कहीं मज़ाल कि मैं उसको एक नज़र देखूँ
कि उसके चेहरे पर सौ आईनों का पहरा है
बस एक शौक़ -ए -तमन्ना-ए दीद है वर्ना
नफ़स-नफ़स शबे-हिज़्राँ को कौन गिनता है
ख़ुदा करे कि कभी अपनी आँख से देखूँ
कि आहे-तमन्ना का रंग कैसा है
यहाँ था वो तो मुझे उसका ध्यान ही कब था
चला गया है तो घर भी उजाड़ लगता है
दुआएं हमने भी माँगी थी मुकेश" रो-रो कर
उजड़ गया है गुलिस्ताँ तो अब्र बरसा है
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