जय जगजननी हे जगता भवानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
तू विंध्याचल देवी कामरूपा
अष्टभुजी तू ही रूद्र स्वरूपा
तू ही सिद्ध मईहर की महारानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
धाई पवन हंसी चंवर डोलावे
सुरुज किरिनियाँ श्रृंगार सजावे
चरण पखारे नित गंगा के पानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
चम-चम माथे मुकुट मणि सोहे
रूप सुघर तोरी छवि मनमोहे
दर्शन पा के सब पाप नसानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
वेद पुराण ग्रन्थ गुण गावे
पाण्डेय मुकेश" भी ध्यान लगावे
जपत निरंतर संत ज्ञानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
तू विंध्याचल देवी कामरूपा
अष्टभुजी तू ही रूद्र स्वरूपा
तू ही सिद्ध मईहर की महारानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
धाई पवन हंसी चंवर डोलावे
सुरुज किरिनियाँ श्रृंगार सजावे
चरण पखारे नित गंगा के पानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
चम-चम माथे मुकुट मणि सोहे
रूप सुघर तोरी छवि मनमोहे
दर्शन पा के सब पाप नसानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
वेद पुराण ग्रन्थ गुण गावे
पाण्डेय मुकेश" भी ध्यान लगावे
जपत निरंतर संत ज्ञानी
जय हे कामाख्या जय कल्यानी
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