यह धनुष तो वज्र के जैसा बना है
टूटता ही नहीं
फिर -फिर लौटते हैं जनक
असफ़ल थके-हारे
सिर झुकाये स्वयं से संवाद करते
पूछते क्यों बेअसर हो गए फिर से शगुन सारे
लिए वंदनवार मालिन
राह में मिलती कभी जब
दृष्टि धरती पर गड़ाए
बहुत तेजी से निकलते
और सखियाँ लौटती ससुराल से जब
माँ बहुत उद्विग्न रहती उन दिनों है
आँख में आँसू मचलते
पस्त होते हौसलों में भी
निकल पड़ते हैं पिता फिर
एक टूटी नाव
पर तूफान में किसको पुकारें
रूप ,रंग ,कद आयु ,शिक्षा ,कुण्डली ,कुल
दक्षिणा संकल्प क्या है -पूछते सब
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