रविवार, 16 अगस्त 2015

असमय प्रेम - डॉ. मुकेश पाण्डेय

उसके प्यार ने जीना
जीना सिखाया है 
टहनी पर एक पत्ती  फूटती है 
धरती को तोड़कर 
बीज द्वीपत्र होता है   
जड़ें पुरे पेड़ को ख़ुराक देती है 
फूल जब खिलते हैं 
तो जड़ें कुछ मांगती नहीं 
फल के पकने पर डालियाँ 
सहज  विनत होती हैं 
मैंने कई बार
Dr.Mukesh Pandey
अपने प्यार को पानी पर लिखा 
उसे जलाकृतियों में बेचैन पाया है 
लहरों से उद्वेलित जल 
तटों की ओर  जाता है
हर जन्म के बाद 
नया क्षितिज खुला पाया 
धरती ने मुझे हर बार 
सहने को कहा है 
तप्त ज्वालाओं के बीच 
हिम किरीट की रक्षा 
कैसे करूँ 

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